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थी सुब्ह जो मुँह को खोल देता
हर-चंद कि तब थी इक पहर रात

When the morning opened the face, There was a night of a few hours.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

जब सुबह मुख को खोल देती थी, तब हर-चंद में एक पहर रात थी।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब ने वक़्त की रूहानी उलझन को बयान किया है। शायर कहते हैं कि जिस सुबह का मुँह खुलता है, यानी जब रोशनी होती है, उस पल का एहसास कितना कम होता है। लेकिन उस पल से पहले का इंतज़ार, वो 'पहर रात', ज़िंदगी की लंबी और थका देने वाली रात जैसा लगता है। यह वक़्त के बहते दरिया पर एक गहरा तफ़कर है।

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