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पर ज़ुल्फ़ों में मुँह छपा के पूछा
अब होवेगी 'मीर' किस क़दर रात

Peeking into your tresses, I asked, 'Meer,' How much more of a night will it be?'

मीर तक़ी मीर
अर्थ

ज़ुल्फ़ों में मुँह छिपाकर मैंने पूछा, 'मीर,' कि अब और रात कितनी बाकी है?

विस्तार

यह शेर एक बहुत ही नज़दीकी और रोमांटिक पल को बयां करता है। महबूबा अपने ज़ुल्फ़ों में मुँह छिपाकर पूछती हैं, 'मीर, अब किस क़दर रात होगी?' यहाँ सवाल सिर्फ रात के समय का नहीं है, बल्कि उस गहराई का है, उस रहस्य का जो दोनों के बीच है। यह रात महज़ एक समय नहीं, बल्कि उनके अनकहे एहसास और तड़प का गवाह है।

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