ग़ज़ल

है हाल जा-ए-गिर्या जान-ए-पुर-आरज़ू का

है हाल जा-ए-गिर्या जान-ए-पुर-आरज़ू का

यह ग़ज़ल विरह और निराशा के गहरे भावों को व्यक्त करती है। शायर कहता है कि वह कभी किसी के दामन को पकड़कर रोने वाला नहीं है, क्योंकि उसकी सुंदरता (ख़ुशबू) अब उठाई नहीं जा सकती। वह अपने प्रिय के आँगन और गली का ज़िक्र करता है, जहाँ कभी वह रात गुज़ारता था, लेकिन अब उसकी आँखों का आँसू और चमन का पानी टूटकर चला गया है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
है हाल जा-ए-गिर्या जान-ए-पुर-आरज़ू का रोए न हम कभू टुक दामन पकड़ किसू का
जा-ए-गिर्या और जान-ए-पुर-आरज़ू के हाल में, हम कभी नहीं रोएँगे और न ही कभी किसी का दामन पकड़ेंगे।
2
जाती नहीं उठाई अपने पे ये ख़ुशूनत अब रह गया है आना मेरा कभू कभू का
यह सुंदरता जो आपने अपने ऊपर नहीं उठाई, अब केवल मेरा कभी-कभार आना बाकी रह गया है।
3
उस आस्ताँ से किस दिन पुर-शोर सर न पटका उस की गली में जा कर किस रात मैं न कूका
उस आस्ताँ से किस दिन पुर-शोर सर न पटका, उस की गली में जा कर किस रात मैं न कूका। (अर्थात, उस स्थान और उस व्यक्ति के करीब रहने के कारण, मैं हर समय और हर रात वहाँ मौजूद रहता था।)
4
शायद कि मुँद गई है क़ुमरी की चश्म-ए-गिर्यां कुछ टूट सा चला है पानी चमन की जू का
शायद चाँदनी की आँखों के आँसू छिप गए हैं, या बगीचे के फूल के बर्तन से कुछ पानी गिर गया है।
5
अपने तड़पने की तो तदबीर पहले कर लूँ तब फ़िक्र मैं करूँगा ज़ख़्मों के भी रफ़ू का
पहले अपने तड़पने का प्रबंध कर लूँगा; तभी मैं ज़ख़्मों को भरने की फ़िक्र करूँगा।
6
दाँतों की नज़्म उस के हँसने में जिन ने देखी फिर मोतियों की लड़ पर उन ने कभू न थूका
उसके हँसने में दाँतों की नज़्म जिन ने देखी, फिर मोतियों की लड़ पर उन ने कभू न थूका। (अर्थ: किसी ने उसके हँसने में दाँतों की जो नज़्म देखी, वह कभी मोतियों की लड़ पर भी नहीं थूकी।)
7
ये ऐश-गह नहीं है याँ रंग और कुछ है हर गुल है इस चमन में साग़र भरा लहू का
यह ऐश-गह नहीं है याँ रंग और कुछ है। इस चमन में हर गुल में रक्त का सागर भरा है।
8
बुलबुल ग़ज़ल-सराई आगे हमारे मत कर सब हम से सीखते हैं अंदाज़ गुफ़्तुगू का
बुलबुल, ग़ज़ल-सराई में आगे मत बढ़; हम सब तुमसे बात करने का अंदाज़ सीखते हैं।
9
गलियाँ भरी पड़ी हैं ऐ बाद ज़ख़्मियों से मत खोल पेच ज़ालिम उस ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू का
गलियाँ ज़ख्मी लोगों के घावों से भरी पड़ी हैं, ऐ प्रिय; उस कस्तूरी-सुगंधित केशराशि के उलझे हुए गुच्छे को ज़ालिम मत खोलना।
10
वे पहली इलतिफ़ातें सारी फ़रेब निकलीं देना न था दिल उस को मैं 'मीर' आह चूका
वे शुरुआती इल्लतिफ़ातें सारी धोखा निकलीं; मैं 'मीर' को अपना दिल देना नहीं चाहता था।
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