है हाल जा-ए-गिर्या जान-ए-पुर-आरज़ू का — मीर तक़ी मीर

है हाल जा-ए-गिर्या जान-ए-पुर-आरज़ू का रोए न हम कभू टुक दामन पकड़ किसू का

“The condition of the soul, filled with tears and yearning, is such that we shall never weep, nor shall we ever clutch at any skirt (of favor).”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

जा-ए-गिर्या और जान-ए-पुर-आरज़ू के हाल में, हम कभी नहीं रोएँगे और न ही कभी किसी का दामन पकड़ेंगे।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ दर्द की बात नहीं करता, बल्कि स्वाभिमान की बात करता है। शायर कहते हैं कि मेरी ज़िंदगी तो ग़म के आँसुओं में डूबी है, मैं तो रो रहा हूँ.... लेकिन मैं कसम खाते हैं कि मैं कभी किसी के दामन को थामकर नहीं रोऊँगा। यह एक ऐसा वक़्त है जब दर्द बहुत गहरा होता है, मगर इंसान अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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