उस आस्ताँ से किस दिन पुर-शोर सर न पटका — मीर तक़ी मीर

उस आस्ताँ से किस दिन पुर-शोर सर न पटका उस की गली में जा कर किस रात मैं न कूका

“From that threshold, on what day did the bustling crowd not shake me, In that lane of hers, on what night did I not wander through?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

उस आस्ताँ से किस दिन पुर-शोर सर न पटका, उस की गली में जा कर किस रात मैं न कूका। (अर्थात, उस स्थान और उस व्यक्ति के करीब रहने के कारण, मैं हर समय और हर रात वहाँ मौजूद रहता था।)

विस्तार

यह शेर एक आशिक़ के दिल की ज़िद, एक बेचैनी को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि वो किसी के आस्ताँ से कभी बिना शोर-शराबे के नहीं गुज़रे हैं, और न ही कभी उसकी गली में चुपचाप बिना जाए। यह इश्क़ का वो नशा है, जो इंसान को बार-बार एक जगह खींच लाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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