ग़ज़ल
चाक पर चाक हुआ जूँ जूँ सुलाया हम ने
चाक पर चाक हुआ जूँ जूँ सुलाया हम ने
यह ग़ज़ल वियोग और निराशा के भाव को व्यक्त करती है, जिसमें शायर अपने जीवन की निराशा और टूटे हुए सपनों का वर्णन करता है। वह कहता है कि उसने सब कुछ खो दिया है और अब उसे सहारे के लिए किसी के भी सहारे की ज़रूरत नहीं है।
गीत सुनें
1
चाक पर चाक हुआ जूँ जूँ सुलाया हम ने
इस गरेबाँ ही से अब हाथ उठाया हम ने
चक्र पर चक्र घूम गया, हमने उसे इतना सुलाया कि अब इसी आलिंगन से हमने हाथ उठा लिया।
2
हसरत-ए-लुत्फ़-ए-अज़ीज़ान-ए-चमन जी में रही
सर पे देखा न गुल-ओ-सर्व का साया हम ने
हसरत-ए-लुत्फ़-ए-अज़ीज़ान-ए-चमन जी में रही, यानी मेरे मन में महबूब की कृपा की चाहत बनी रही। मैंने कभी भी फूल और सिर की छाया नहीं देखी।
3
जी में था अर्श पे जा बाँधिए तकिया लेकिन
बिस्तरा ख़ाक ही में अब तो बिछाया हम ने
हे भगवान, आप स्वर्ग में सिंहासन पर तकिया बाँधते होंगे, लेकिन हमने तो अब बिस्तर धूल में बिछा दिया है।
4
बा'द यक उम्र कहीं तुम को जो तन्हा पाया
डरते डरते ही कुछ अहवाल सुनाया हम ने
एक लंबे समय के बाद, जब मुझे तुम कहीं अकेले मिले, तो मैंने डर और घबराहट के कारण तुम्हें कुछ बातें सुनाई।
5
याँ फ़क़त रेख़्ता ही कहने न आए थे हम
चार दिन ये भी तमाशा सा दिखाया हम ने
हम यहाँ सिर्फ़ शायरी करने नहीं आए थे, हमने तो बस इन चार दिनों का एक तमाशा दिखाया है।
6
बारे कल बाग़ में जा मुर्ग़-ए-चमन से मिल कर
ख़ूबी-ए-गुल का मज़ा ख़ूब उड़ाया हम ने
कल बाग़ में जाकर मुर्ग़-ए-चमन से मिलने के बाद, हमने फूल की ख़ूबसूरती का मज़ा बहुत लिया।
7
ताज़गी दाग़ की हर शाम को बे-हेच नहीं
आह क्या जाने दिया किस का बुझाया हम ने
ताज़गी दाग़ की हर शाम को बे-हेच नहीं, आह क्या जाने दिया किस का बुझाया हम ने। इसका अर्थ है कि ताज़गी के दाग़ हर शाम को बेचैन नहीं होते, आह, क्या जानें हमने किसका बुझा दिया।
8
दश्त-ओ-कोहसार में सर मार के चंदे तुझ बिन
क़ैस-ओ-फ़रहाद को फिर याद दिलाया हम ने
दश्त-ओ-कोहसार में सर मार के चंदे तुझ बिन, क़ैस-ओ-फ़रहाद को फिर याद दिलाया हम ने। इसका अर्थ है कि हमने जंगल और पहाड़ों में भाले से वार करके (या संदर्भ देकर) क़ैस और फ़रहाद को तुम्हारा स्मरण कराया।
9
बेकली से दिल-ए-बेताब की मर गुज़रे थे
सो तह-ए-ख़ाक भी आराम न पाया हम ने
बेकली से बेचैन दिल गुज़र गया; हम तो तह-ए-ख़ाक में भी आराम नहीं कर पाए।
10
ये सितम ताज़ा हुआ और कि पाईज़ में 'मीर'
दिल ख़स-ओ-ख़ार से नाचार लगाया हम ने
यह अत्याचार ताज़ा हुआ और कि पाईज़ में 'मीर', हमने दिल को काँटों और गुलाबों से घायल किया।
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