हसरत-ए-लुत्फ़-ए-अज़ीज़ान-ए-चमन जी में रही — मीर तक़ी मीर

हसरत-ए-लुत्फ़-ए-अज़ीज़ान-ए-चमन जी में रही सर पे देखा न गुल-ओ-सर्व का साया हम ने

“In the garden of the beloved's grace, my yearning remained, I never saw the shade of the flower and the head.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

हसरत-ए-लुत्फ़-ए-अज़ीज़ान-ए-चमन जी में रही, यानी मेरे मन में महबूब की कृपा की चाहत बनी रही। मैंने कभी भी फूल और सिर की छाया नहीं देखी।

विस्तार

यह शेर बताता है कि इश्क़ की यादें किसी भी भौतिक चीज़ से ज़्यादा गहरी होती हैं। शायर कहते हैं कि मैंने कभी गुल और सर्व का साया नहीं देखा.... लेकिन महबूब की कृपा की हसरत तो दिल में हमेशा बनी रही! यह उस एहसास को बयां करता है जो आँखों से नहीं, बल्कि रूह से महसूस होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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