Sukhan AI
ग़ज़ल

ताक़त नहीं है दिल मैं ने जी बजा रहा है

ताक़त नहीं है दिल मैं ने जी बजा रहा है

यह ग़ज़ल बताती है कि दिल में अब कोई ताक़त नहीं बची है, और वक्ता को अपनी भावनाओं का सहारा देने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। वह कहता है कि दिखावा और नज़ाकत अब बेकार हो गई है, और सारे रहस्य खुले आ चुके हैं। यह मोहब्बत के टूटने और अकेलेपन के दर्द को बयां करती है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
ताक़त नहीं है दिल मैं ने जी बजा रहा है क्या नाज़ कर रहे हो अब हम में क्या रहा है
मेरे दिल में अब यह तराना बजाने की ताक़त नहीं बची है। आप अब हमसे इतना नाज़ क्यों कर रहे हैं? हमारे अंदर अब क्या बचा है?
2
जेब और आस्तीं से रोने का काम गुज़रा सारा निचोड़ अब तो दामन पर रहा है
जेब और आस्तीन से रोने का काम गुज़र गया है; सारा निचोड़ अब तो दामन पर आ रहा है।
3
अब चैत गर नहीं कुछ ताज़ा हुआ हूँ बेकल आया हूँ जब ब-ख़ुद में जी इस में जा रहा है
अब चैत गर नहीं कुछ ताज़ा हुआ हूँ बेकल। आया हूँ जब ब-ख़ुद में जी इस में जा रहा है।
4
काहे का पास अब तो रुस्वाई दूर पहुँची राज़-ए-मोहब्बत अपना किस से छपा रहा है
अब यह पूछने का क्या मतलब है कि रुस्वाई कितनी दूर तक पहुँच गई? यह रहस्यमयी प्रेम का राज़ किस से छिपाया जा रहा है।
5
गर्द-ए-रह उस की यारब किस और से उठेगी सौ सौ ग़ज़ाल हर-सू आँखें लगा रहा है
गर्द-ए-रह उस की यारब किस और से उठेगी, यानी मेरे विरह के धूल से उसकी प्रियतमा किसी और से कैसे उठेगी। सौ सौ ग़ज़ाल हर-सू आँखें लगा रहा है, यानी मेरी आँखें हर दिशा में सौ-सौ ग़ज़लें बहा रही हैं।
6
बंदे तो तरहदार व्हीं तरह कश तुम्हारे फिर चाहते हो क्या तुम अब इक ख़ुदा रहा है
बंदे तो तरहदार वही तरह किस तुम्हारे, फिर चाहते हो क्या तुम अब इक ख़ुदा रहा है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि मनुष्य तो तुम जैसे ही हैं, और फिर तुम अब क्या चाहते हो? क्या कोई ईश्वर नहीं बचा है।
7
देख उस दहन को हर-दम आरसी कि यूँ ही ख़ूबी का दर कसो के मुँह पर भी वा रहा है
देख उस जलते हुए दहन को हर पल, ऐ आरसी, कि यह यूँ ही ख़ूबसूरती का दरश (झलक) तुम्हारे मुँह पर भी बरसा रहा है।
8
वे लुत्फ़ की निगाहें पहले फ़रेब हैं सब किस से वो बे-मुरव्वत फिर आश्ना रहा है
ये कृपा या प्रेम की निगाहें सब धोखा हैं; वह निर्लज्ज किस से फिर से स्नेह कर रहा है।
9
इतना ख़िज़ाँ करे है कब ज़र्द रंग पर याँ तू भी कसो निगह से गुल जुदा रहा है
अर्थात, जब पीले रंग पर इतना पतझड़ आया, हे गुल, तू भी अपनी निगाह से ऐसा रख कि तू मुझसे दूर न हो।
10
रहते हैं दाग़ अक्सर नान-ओ-नमक की ख़ातिर जीने का उस समयँ में अब क्या मज़ा रहा है
दाग़ अक्सर नान-ओ-नमक की ख़ातिर रहते हैं; उस समय में जीने का अब क्या मज़ा रहा है।
11
अब चाहता नहीं है बोसा जो तेरे लब से जीने से 'मीर' शायद कुछ दिल उठा रहा है
अब बोसा तुम्हारे होंठों से क्या चाहता है, जीने के प्रयास से 'मीर' शायद कोई दिल उठा रहा है।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.