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अब चाहता नहीं है बोसा जो तेरे लब से जीने से 'मीर' शायद कुछ दिल उठा रहा है

Bosa no longer desires what is from your lips; 'Mir' perhaps is lifting some heart from the act of living.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

अब बोसा तुम्हारे होंठों से क्या चाहता है, जीने के प्रयास से 'मीर' शायद कोई दिल उठा रहा है।

विस्तार

यह शेर उस गहरी उदासी को बयां करता है जब जीना भी बोझ लगने लगे। महबूब के होंठों का कोई इत्र या कोई चुंबन अब मायने नहीं रखता। शायर कह रहे हैं कि अब तो बस ज़िंदा रहने का दर्द इतना गहरा है... कि दिल खुद ही किसी चीज़ से घिस रहा है। यह इश्क़ के उस मोड़ की बात है, जहाँ वजूद ही एक सज़ा बन जाता है।

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