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अब चैत गर नहीं कुछ ताज़ा हुआ हूँ बेकल आया हूँ जब ब-ख़ुद में जी इस में जा रहा है

Now, the spring season has not refreshed me at all, As I've returned to my own self, I am getting lost in this state.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

अब चैत गर नहीं कुछ ताज़ा हुआ हूँ बेकल। आया हूँ जब ब-ख़ुद में जी इस में जा रहा है।

विस्तार

यह शेर उस पल को बयान करता है जब हमें बाहरी बदलाव का इंतज़ार करना छोड़ना पड़ता है। शायर कहते हैं कि अगर वसंत का आना भी हमें ताज़गी नहीं दे पाया, तो क्या हुआ? असली बात तो यह है कि हम अपनी ही भावनाओं में खो गए हैं। यह एहसास कि दर्द बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर से आ रहा है, कितना गहरा होता है। यह आत्म-खोज की एक खूबसूरत दास्तान है।

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