ग़ज़ल
यारब कोई हो इश्क़ का बीमार न होवे
यारब कोई हो इश्क़ का बीमार न होवे
यह ग़ज़ल एक ऐसी प्रेम-भावना का वर्णन करती है जो शारीरिक और भावनात्मक कष्टों से मुक्त हो। इसमें कामना की गई है कि वियोग या प्रेम के आघात से कोई भी कभी बीमार न पड़े या मर न जाए। यह बताती है कि सच्चा प्रेम किसी भी बंधन या नुकसान का कारण नहीं बनना चाहिए।
गीत सुनें
1
यारब कोई हो इश्क़ का बीमार न होवे
मर जाए वले उस को ये आज़ार न होवे
हे रब, कोई ऐसा हो जो इश्क़ की बीमारी से न पीड़ित हो, और न ही वले (प्रेमी) को इस आज़ार (बीमारी/पीड़ा) से मृत्यु प्राप्त हो।
2
ज़िंदाँ में फँसे तौक़ पड़े क़ैद में मर जाए
पर दाम-ए-मोहब्बत में गिरफ़्तार न होवे
अगर मैं जेल में फँस जाऊँ तो कैद में मर सकता हूँ, लेकिन मोहब्बत की कीमत पर कभी पकड़ा नहीं जाऊंगा।
3
उस वास्ते काँपूँ हूँ कि है आह निपट सर्द
ये बाव कलेजे के कहीं पार न होवे
इस वजह से मैं काँप रहा हूँ, क्योंकि आह बहुत ठंडी है। ये पागल दिल कभी इसके पार नहीं हो सकते।
4
सद नाला-ए-जान-काह हैं वाबस्ता चमन से
कोई बाल शिकस्ता पस-ए-दीवार न होवे
मेरे जीवन की नली एक बाग़ से जुड़ी हुई है; कहीं दीवार के पीछे कोई बाल न उखड़ा दे।
5
पज़मुर्दा बहुत है गुल-ए-गुलज़ार हमारा
शर्मिंदा-ए-यक-गोशा-ए-दस्तार न होवे
हमारे फूलों के बगीचे में बहुत से मुरझाए फूल हैं, और मैं चाहता हूँ कि आप अपने दुपट्टे के एक कोने पर कभी शर्मिंदा न हों।
6
माँगे है दुआ ख़ल्क़ तुझे देख के ज़ालिम
यारब कसो को उस से सरोकार न होवे
लोगों को तुम्हें देखकर दुआएँ माँगनी हैं, ऐ ज़ालिम; दोस्त, ये सुनिश्चित करना कि उनका तुमसे कोई लगाव न हो।
7
किस शक्ल से अहवाल कहूँ अब मैं इलाही
सूरत से मिरी जिस में वो बेज़ार न होवे
मैं ईश्वर से यह कैसे कहूँ कि मेरी किस सूरत से मेरी हालत का वर्णन करूँ, जिससे वे लोग मुझसे ऊब न जाएँ।
8
हूँ दोस्त जो कहता हूँ सिन ऐ जान के दुश्मन
बेहतर तो तुझे तर्क है ता-ख़्वार न होवे
मैं वह दोस्त हूँ जो कहता हूँ, 'ओह, जीवन के दुश्मन,' बेहतर है कि तुम्हें वह तर्क मिले जो न नष्ट हो।
9
ख़ूबाँ बुरे होते हैं अगरचे हैं नकोरो
बे-जुर्म कहीं उन का गुनहगार न होवे
ये बहुत बुरे होते हैं, भले ही ये अपराधी न हों, फिर भी इन्हें किसी चीज़ का दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।
10
बाँधे न फिरे ख़ून पर अपनी तो कमर को
ये जान-ए-सुबुक तन पे तिरे बार न होवे
अगर तुमने अपने खून से खुद को नहीं बांधा, तो तुम्हारी कमर मेरे शरीर पर नहीं टूटेगी।
11
चलता है रह-ए-इश्क़ ही उस पर भी चले तू
पर एक क़दम चल कहीं ज़िन्हार न होवे
शायर कहता है कि इश्क़ का रास्ता उस पर भी चलता है, इसलिए तुम उस पर चल सकती हो, पर एक कदम भी कहीं भी मत चलना, कहीं तुम्हारा कोई साथी न मिल जाए।
12
सहरा-ए-मोहब्बत है क़दम देख के रख 'मीर'
ये सैर सर-ए-कूचा-ओ-बाज़ार न होवे
मीर, मोहब्बत का रेगिस्तान है, इसलिए तू गली-कूचों और बाज़ारों में घूमना नहीं।
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