ग़ज़ल

कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से

कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से

यह ग़ज़ल एक रहस्यमय और तीव्र प्रेम की भावना को व्यक्त करती है, जहाँ कवि का प्रेम इतना गहरा है कि वह एक तरह के शाप या जादू जैसा लगता है। इसमें प्रेमी अपनी प्रेमिका की सुंदरता और उपस्थिति से प्रभावित है, और उसके प्रेम के कारण दिल में एक अथक जलन और दर्द महसूस करता है। यह प्रेम समर्पण, विरह और दैवीय कृपा की कामना का मिश्रण है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से पर्दा उठा तो लड़ियाँ आँखें हमारी हम से
शायर पूछ रहा है कि कब से नज़र दरवाज़ा-ए-हरम से लगी थी, और जब पर्दा उठा तो लड़ियाँ आँखें हमारी हम से।
2
सूरत-गर-ए-अजल का क्या हाथ था कहे तो खींची वो तेग़-ए-अबरू फ़ौलाद के क़लम से
सूरत-गर-ए-अजल के हाथ में क्या ताकत थी, यह कहने की बात ही नहीं। उसने तो अपनी भौंह की तलवार को स्टील के कलम से खींच लिया था।
3
सोज़िश गई न दिल की रोने से रोज़-ओ-शब के जलता हूँ और दरिया बहते हैं चश्म-ए-नम से
मेरा दिल रोने से दिनों और रातों में जल गया है, और मेरे नम आँखों से नदियाँ बह रही हैं।
4
ताअ'त का वक़्त गुज़रा मस्ती में आब रज़ की अब चश्म-दाश्त उस के याँ है फ़क़त करम से
ताअ'त का समय मस्ती में आब-ए-रज़ की तरह गुज़र गया; अब केवल उसकी यादें और कृपा ही आँखों में बाकी हैं।
5
कुढि़ए न रोइए तो औक़ात क्यूँके गुज़रे रहता है मश्ग़ला सा बार-ए-ग़म-ओ-अलम से
अगर तुम दुःख में नहीं रोओगे, तो समय कैसे गुज़रेगा, मानो वह ग़म और दर्द के बोझ से भरा हो।
6
मशहूर है समाजत मेरी कि तेग़ बरसी पर मैं न सर उठाया हरगिज़ तिरे क़दम से
समाज में मेरी ख्याति है कि मैं एक प्रचंड तूफ़ान हूँ, फिर भी मैंने कभी तुम्हारे कदमों से सिर नहीं उठाया।
7
बात एहतियात से कर ज़ाएअ' न कर नफ़स को बालीदगी-ए-दिल है मानिंद-ए-शीशा दम से
बात एहतियात से कर, अपनी नफ़स को ज़ाया न कर; क्योंकि दिल की वफ़ादारी शीशे के समान है, जो पल भर में टूट सकती है।
8
क्या क्या तअब उठाए क्या क्या अज़ाब देखे तब दिल हुआ है उतना ख़ूगर तिरे सितम से
तुमने कितने कष्ट उठाए और कितने अज़ाब देखे, इतने से दिल भी उतना साहसी हो गया तुम्हारे अत्याचार से।
9
हस्ती में हम ने आ कर आसूदगी न देखी खुलतीं न काश आँखें ख़्वाब ख़ुश अदम से
किसी यात्री के सामने आकर मैंने शांति नहीं देखी, / मेरी आँखें, जो खुल नहीं सकीं, वे खुशी के सपने देखती रहीं।
10
पामाल कर के हम को पछताओगे बहुत तुम कमयाब हैं जहाँ में सर देने वाले हम से
पामाल कर के हम को पछताओगे बहुत तुम, कामयाब हैं जहाँ में सर देने वाले हम से।
11
दिल दो हो 'मीर' साहब उस बद-मआ'श को तुम ख़ातिर तो जम्अ' कर लो टक क़ौल से क़सम से
मीर साहब, उस बद-मआश व्यक्ति के लिए तुम दो दिल जमा कर लो, यह वादा और कसम दोनों से।
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