कुढि़ए न रोइए तो औक़ात क्यूँके गुज़रे — मीर तक़ी मीर
कुढि़ए न रोइए तो औक़ात क्यूँके गुज़रे
रहता है मश्ग़ला सा बार-ए-ग़म-ओ-अलम से
“If you do not weep in sorrow, why does time pass by As if from the burden of grief and pain?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
अगर तुम दुःख में नहीं रोओगे, तो समय कैसे गुज़रेगा, मानो वह ग़म और दर्द के बोझ से भरा हो।
विस्तार
यह शेर ग़म के उस एहसास को बयां करता है जो रुकता नहीं। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि आँसू बहाने से वक़्त नहीं रुकता। बल्कि, यह ग़म और दर्द की लहरें इतनी मज़बूत होती हैं कि हमारा दिल, हमारा दिमाग़.... बस इसी मश्ग़ले में लगा रहता है। इसलिए वक़्त गुज़रता ही रहता है, चाहे आप रोएं या न रोएं।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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