ग़ज़ल

जो मैं न हूँ तो करो तर्क नाज़ करने को

जो मैं न हूँ तो करो तर्क नाज़ करने को

यह ग़ज़ल स्वयं के अस्तित्व पर प्रश्न उठाती है और एक सच्चे, वास्तविक 'स्व' को खोजने की तड़प व्यक्त करती है। कवि कहता है कि यदि वह स्वयं नहीं है, तो तर्क और बहस क्यों किए जाएँ। वह जीवन में एक ऐसी वास्तविकता की तलाश में है जो केवल कल्पना या सतही नज़ारों से परे हो।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
जो मैं न हूँ तो करो तर्क नाज़ करने को कोई तो चाहिए जी भी नियाज़ करने को
अगर मैं यहाँ नहीं हूँ, तो मेरी प्रशंसा करने के लिए तर्क मत करना। कोई तो ऐसा होना चाहिए जो मेरी मेहरबानी की मांग करे।
2
न देखो ग़ुंचा-ए-नर्गिस की ओर खुलते में जो देखो उस की मिज़ा नीम-बाज़ करने को
न देखो नर्गिस के गुच्छे के खिलने की ओर, बल्कि उस स्वभाव को देखो जो मन को मोहित करने के लिए बना है।
3
न सोए नींद भर इस तंगना में ता न मूए कि आह जा न थी पा के दराज़ करने को
न सोना, बस इस तंग घर को भरने के लिए, और न ही इससे वंचित होना, क्योंकि लालसा की सुगंध को दराज़ करने के लिए नहीं था।
4
जो बे-दिमाग़ी यही है तो बन चुकी अपनी दिमाग़ चाहिए हर इक से साज़ करने को
यदि यही बेबुद्ध मन है, तो अपना मन बन चुका है; हर किसी से खेलने के लिए बुद्धि चाहिए।
5
वो गर्म नाज़ हो तो ख़ल्क़ पर तरह्हुम कर पुकारे आप अजल एहतिराज़ करने को
अगर यह एक गर्म नज़ाकत है, तो लोगों पर मेहरबान बनो, क्योंकि वे विरोध करने के लिए पुकार रहे हैं।
6
जो आँसू आवें तो पी जा कि ता रहे पर्दा बला है चश्म-ए-तर इफ़शा-ए-राज़ करने को
जो आँसू आएं तो उन्हें पी लेना, नहीं तो पर्दा उस आंसू भरी आँख से उठ जाएगा जो राज़ खोलने को है।
7
समंद नाज़ से तेरे बहुत है 'अर्सा तंग तनिक तो तर्क कर इस तर्क ताज़ करने को
समंद नाज़ से तेरे बहुत है, 'अर्सा' बहुत तंग है। तनिक तो तर्क कर, इस तर्क को ताज़ा करने को।
8
बसान-ए-ज़र है मिरा जिस्म-ए-ज़ार सारा ज़र्द असर तमाम है दिल के गुदाज़ करने को
मेरा शरीर एक पीला पड़ चुका पतझड़ का पत्ता है, जो पूरी तरह से उजाड़ है; इसका असर दिल को गुदाज़ करने का है।
9
हनूज़ लड़के हो तुम क़द्र मेरी क्या जानो शु'ऊर चाहिए है इम्तियाज़ करने को
तुम अभी लड़के हो, तुम मेरी क़द्र कैसे जानोगे। मुझे इस क़द्र को समझने के लिए एहसास चाहिए।
10
अगरचे गुल भी नुमूद उस के रंग करता है व-लेक चाहिए है मुँह भी नाज़ करने को
अगर गुलाब भी उसका रंग दिखाता है, पर मुझे एक चेहरा चाहिए जो सजाने के काम आए।
11
ज़ियादा हद से थी ताबूत-ए-'मीर' पर कसरत हुआ न वक़्त मुसाइद नमाज़ करने को
मीर के ताबूत पर हद से ज़्यादा खर्च हुआ, और न ही वक़्त मुसाइद नमाज़ करने को मिला।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.