ग़ज़ल
क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश
क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश
यह ग़ज़ल एक प्रियजन के प्रति अनगिनत, अनकही इच्छाओं और भावनाओं का वर्णन करती है। शायर कहता है कि वह प्रिय से क्या कह सकता है और क्या रख सकता है, क्योंकि उसके मन में प्यार की अनगिनत ख्वाहिशें भरी पड़ी हैं। यह कविता प्रेम की जटिलता और उसके कारण उत्पन्न होने वाली बेबसी को दर्शाती है।
गीत सुनें
1
क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश
यक जान ओ सद तमन्ना यक दिल हज़ार ख़्वाहिश
यार, मैं तुझसे क्या कहूँ और क्या रखूँ, ये ख्वाहिशें? एक जान, ओ सद तमन्ना, एक दिल में हज़ार ख्वाहिशें।
2
ले हाथ में क़फ़स टुक सय्याद चल चमन तक
मुद्दत से है हमें भी सैर-ए-बहार ख़्वाहिश
हाथ में पिंजरा लेकर, जैसे सैयद बगीचे में टहल रहा हो, हमें भी बहुत समय से बसंत की सैर की इच्छा है।
3
ने कुछ गुनह है दिल का ने जुर्म-ए-चश्म इस में
रखती है हम को इतना बे-इख़्तियार ख़्वाहिश
क्या यह दिल का कोई गुनाह है या आँखों का कोई पाप, इस इच्छा में हमें इतना बेबस रखती है।
4
हालाँकि 'उम्र सारी मायूस गुज़री तिस पर
क्या क्या रखें हैं उस के उम्मीद-वार ख़्वाहिश
भले ही मेरा पूरा जीवन निराशा में बीत गया हो, फिर भी मैं उसके लिए क्या उम्मीदें और इच्छाएँ रखूँ?
5
ग़ैरत से दोस्ती की किस किस से होजे दुश्मन
रखता है यारी ही की सारा दयार ख़्वाहिश
ग़रत से दोस्ती की किस-किस से हो जाए दुश्मन। रखता है यारी ही की सारा दयार ख़्वाहिश।
6
हम मेहर ओ रज़ क्यूँ कर ख़ाली हों आरज़ू से
शेवा यही तमन्ना फ़न ओ शि'आर ख़्वाहिश
हे मेहर और रज़, क्यों खाली करें आरज़ू से? शेवा, यही तमन्ना फ़न और शि'आर ख़्वाहिश।
7
उठती है मौज हर यक आग़ोश ही की सूरत
दरिया को है ये किस का बोस ओ कनार ख़्वाहिश
हर आलिंगन की छवि से एक लहर उठती है; यह नदी किसकी है, या यह किनारा किसकी इच्छा है।
8
सद रंग जल्वा-गर है हर जादा ग़ैरत गुल
'आशिक़ की एक पावे क्यूँ कर क़रार ख़्वाहिश
हर फूल अपनी चमक से मन मोह लेता है, फिर भी प्रेमी की इच्छा किसी एक बात पर क्यों ठहर जाती है।
9
यक बार बर न आए उस से उमीद दिल की
इज़हार करते कब तक यूँ बार बार ख़्वाहिश
उससे उम्मीद की कि एक बार बारिश आएगी, दिल कहता है कि अब बार-बार ख्वाहिशें इज़हार करते हुए उम्मीद रखना कब तक सही है।
10
करते हैं सब तमन्ना पर 'मीर' जी न इतनी
रक्खेगी मार तुम को पायान-ए-कार ख़्वाहिश
सब लोग हर इच्छा करते हैं, लेकिन मीर जी, आपके कदमों को इतनी इच्छा नहीं रख पाएगी।
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