उठती है मौज हर यक आग़ोश ही की सूरत — मीर तक़ी मीर
उठती है मौज हर यक आग़ोश ही की सूरत
दरिया को है ये किस का बोस ओ कनार ख़्वाहिश
“A wave rises from the image of every embrace, To whom does this river belong, or whose desire is the shore?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
हर आलिंगन की छवि से एक लहर उठती है; यह नदी किसकी है, या यह किनारा किसकी इच्छा है।
विस्तार
यह शेर भावनाओं के गहरे उथल-पुथल को बयान करता है। शायर कहते हैं कि हर आलिंगन या मुलाकात से लहरें उठती हैं। लेकिन वह सवाल करते हैं कि यह बेचैनी किसकी है—क्या यह नदी (जीवन) के लिए है, या किनारे (शांति) के लिए? यह हमारी हर चाहत के स्रोत पर एक गहरा दार्शनिक प्रश्न है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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