ग़ज़ल

कोफ़्त से जान लब पे आई है

कोफ़्त से जान लब पे आई है

यह ग़ज़ल प्रेम में मिले आघातों और जीवन की जटिलताओं पर बात करती है। शायर शिकायत करता है कि उसके दिल पर क्या चोट लगी है, और किन इच्छाओं या परिस्थितियों ने उसे इस दर्द से गुज़रे हुए दिखाया है। यह ग़ज़ल नियति के हाथों मिले कष्टों और हृदय की नाजुकता को दर्शाती है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कोफ़्त से जान लब पे आई है हम ने क्या चोट दिल पे खाई है
कफ़न से जान लब पे आई है, हम ने क्या चोट दिल पे खाई है।
2
लिखते रुक़ा लिखे गए दफ़्तर शौक़ ने बात क्या बढ़ाई है
लिखते-पढ़ा दफ़्तर (मेज) और लिखे गए ख़त, शौक़ ने बात में क्या बढ़ा दी है।
3
आरज़ू उस बुलंद ओ बाला की क्या बला मेरे सर पे लाई है
आसमान में रहने वाले उस महान और गौरवशाली व्यक्ति का क्या दोष है, कि मेरे सिर पर यह विपत्ति ले आया है।
4
दीदनी है शिकस्तगी दिल की क्या इमारत ग़मों ने ढाई है
दीदनी है शिकस्तगी दिल की, क्या इमारत ग़मों ने ढाई है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि यह हृदय के टूटने का घाव है, और ग़मों ने ढाई (दो और आधा) का क्या ढाँचा बनाया है।
5
है तसन्नो कि लाल हैं वे लब यानी इक बात सी बनाई है
क्या वे होंठ बच्चे के हैं, या वे लाल हैं? / उन्होंने एक बात या एक पंक्ति बनाई है।
6
दिल से नज़दीक और इतना दूर किस से उस को कुछ आश्नाई है
दिल के पास होना और इतना दूर होना, किस से उस को कोई यकीन मिल सकता है।
7
बे-सुतूँ क्या है कोहकन कैसा इश्क़ की ज़ोर आज़माई है
बेसुतूँ और कोहकन का क्या अर्थ है, और आज इसने प्रेम की शक्ति को कैसे परखा है।
8
जिस मरज़ में कि जान जाती है दिलबरों ही की वो जुदाई है
जिस बीमारी में जान चली जाती है, वो प्रियतम से बिछड़ना है।
9
याँ हुए ख़ाक से बराबर हम वाँ वही नाज़ ओ ख़ुद-नुमाई है
हम धूल से नहीं हैं, क्योंकि हम में वह अनोखा नज़ाकत और आत्म-सम्मान है।
10
ऐसा मौता है ज़िंदा-ए-जावेद रफ़्ता-ए-यार था जब आई है
ऐसा मौता है ज़िंदा-ए-जावेद, जब रफ़्ता-ए-यार आई है। इसका अर्थ है कि जैसे शाश्वत जीवन में भी एक मृत शरीर जैसा महसूस होता है, जब प्रियतम का आगमन होता है।
11
मर्ग-ए-मजनूँ से अक़्ल गुम है 'मीर' क्या दिवाने ने मौत पाई है
मजनू के मार्ग से पागलपन आ गया है, मीर। क्या किसी प्रेमी को मौत मिल पाई है?
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