ग़ज़ल
जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताज-वरी का
जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताज-वरी का
यह ग़ज़ल घमंड और अहंकार के क्षणभंगुर स्वरूप पर प्रकाश डालती है। यह बताती है कि आज जिस सिर पर गर्व या ताज का आवरण है, कल उस पर निराशा और शोक का शोर होगा। जीवन के हर सफर में, चाहे वह मंज़िल की ओर हो या कहीं और, कोई भी सुरक्षित नहीं है।
गीत सुनें
1
जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताज-वरी का
कल उस पे यहीं शोर है फिर नौहागरी का
जिस सिर पर आज घमंड या ताज-पहनने का गर्व है, कल उसी जगह फिर मातम और विलाप का शोर होगा।
2
शर्मिंदा तिरे रुख़ से है रुख़्सार परी का
चलता नहीं कुछ आगे तिरे कब्क-ए-दरी का
तुम्हारे मुख से परियों की गालों की लाली शर्मिंदा है, और तुम्हारी कमर-पटिया से कुछ भी आगे नहीं बढ़ सकता।
3
आफ़ाक़ की मंज़िल से गया कौन सलामत
अस्बाब लुटा राह में याँ हर सफ़री का
आसमान की मंज़िल से कौन सलामत लौटता है? चाहे वह रास्ते में बिखरे हालात हों, या हर मुसाफ़िर का अपना हाल।
4
ज़िंदाँ में भी शोरिश न गई अपने जुनूँ की
अब संग मुदावा है इस आशुफ़्ता-सरी का
ज़िंदाँ में भी अपने जुनून की शोहरत नहीं गई; अब इस आशुफ़्ता दिल का मुदावा साथ है।
5
हर ज़ख़्म-ए-जिगर दावर-ए-महशर से हमारा
इंसाफ़-तलब है तिरी बेदाद-गरी का
हर दिल का ज़ख्म महशर के दिन से न्याय की मांग करता है, तुम्हारी बेपरवाही के लिए।
6
अपनी तो जहाँ आँख लड़ी फिर वहीं देखो
आईने को लपका है परेशाँ-नज़री का
अपनी तो जहाँ आँख लड़ी फिर वहीं देखो, आईने को लपका है परेशाँ-नज़री का।
7
सद मौसम-ए-गुल हम को तह-ए-बाल ही गुज़रे
मक़्दूर न देखा कभू बे-बाल-ओ-परी का
फूलों के मौसम में, बस हमारे दिल को बालों के नीचे ही गुज़रने दो; मैंने कभी भी सुंदरता और परियों के बिना किसी का नसीब नहीं देखा।
8
इस रंग से झमके है पलक पर कि कहे तू
टुकड़ा है मिरा अश्क अक़ीक़-ए-जिगरी का
यह बताओ कि मेरी पलक पर यह चमक किस रंग से जगमगाती है; क्या मेरा आँसू मेरे सबसे प्यारे दिल का एक टुकड़ा है।
9
कल सैर किया हम ने समुंदर को भी जा कर
था दस्त-ए-निगर पंजा-ए-मिज़्गाँ की तरी का
कल हम सैर करके समुंदर तक गए, / जैसे किसी महान मोर के हाथ और पंजे की राह पर।
10
ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का
साँस भी धीरे ले, क्योंकि आफ़ाक़ की इस शायरी की कार्यशाला बहुत नाज़ुक है।
11
टुक 'मीर'-ए-जिगर-सोख़्ता की जल्द ख़बर ले
क्या यार भरोसा है चराग़-ए-सहरी का
टुक 'मीर'-ए-जिगर-सोख़्ता, मेरी जल्द ख़बर लाओ, क्या यार सुबह की रोशनी के दीये पर भरोसा है।
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