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ग़ज़ल

हर जज़्र-ओ-मद से दस्त-ओ-बग़ल उठते हैं ख़रोश

हर जज़्र-ओ-मद से दस्त-ओ-बग़ल उठते हैं ख़रोश

यह ग़ज़ल बताती है कि हर ज्वार और भाटा के साथ हाथ और बगल से खरोंचें उठती हैं। यह जीवन के उतार-चढ़ावों के साथ आने वाले दर्द और रहस्यमय प्रेम की भावनाओं का वर्णन करती है, जहाँ हर लहर और हर मोती किसी न किसी कहानी का गवाह है।

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1
हर जज़्र-ओ-मद से दस्त-ओ-बग़ल उठते हैं ख़रोश किस का है राज़ बहर में यारब कि ये हैं जोश
हर ज्वार-भाटे से हाथ और कोहनी झाग के रूप में उठते हैं, यह कौन सा रहस्य है, ऐ दोस्त, कि सागर में इतना जोश है।
2
अबरू-ए-कज है मौज कोई चश्म है हबाब मोती किसी की बात है सीपी किसी का गोश
अबरू-ए-कज है मौज कोई चश्म है हबाब। मोती किसी की बात है, सीपी किसी का गोश।
3
उन मुग़्बचों के कूचे ही से मैं क्या सलाम क्या मुझ को तौफ़-ए-काबा से में रिंद-ए-दर्द-नोश
उन मूर्ख लोगों की गलियों से मुझे क्या सलाम करना, और क्या मुझे काबा की कृपा से दर्द का नशा है।
4
हैरत से होवे परतव-ए-मह नूर आईना तू चाँदनी में निकले अगर हो सफ़ेद-पोश
तुम्हारा सफ़ेद वस्त्र और चाँदनी में तुम्हारा निकलना देखकर, चाँद के नूर का परदा (परतव-ए-मह) भी आश्चर्यचकित हो जाता है।
5
कल हम ने सैर-ए-बाग़ में दिल हाथ से दिया इक सादा गुल-फ़रोश का आ कर सबद ब-दोश
कल हम ने सैर-ए-बाग़ में दिल हाथ से दिया, जब एक सादा गुल-फ़रोश आया और मधुर वचन दिए।
6
जाता रहा निगाह से जूँ मौसम-ए-बहार आज उस बग़ैर दाग़-ए-जिगर हैं सियाह-पोश
नज़र से जैसे मौसम-ए-बहार बीत गया, आज उस पर दाग़-ए-जिगर के बिना वह काले वस्त्र में है।
7
शब इस दिल-ए-गिरफ़्ता को वा कर ब-ज़ोर-ए-मय बैठे थे शीरा-ख़ाने में हम कितने हर्ज़ा-कोश
हे दिल, बंदी मन, बलपूर्वक मय के नशे से ऐसा क्यों कर रहे हो? हम तो शायरखाने में बैठे थे, कितने व्याकुल और परेशान थे।
8
आई सदा कि याद करो दूर रफ़्ता को 'इबरत भी है ज़रूर टक ऐ जम' तेज़ होश
हे, मुझे याद करना, जो दूर चला गया है, क्योंकि तीव्र जागरूकता में निश्चित रूप से एक सबक है।
9
जमशेद जिस ने वज़' किया जाम क्या हुआ वे नसीहतें कहाँ गईं कीधर वे नाव-नोश
जमशेद ने जिस तरह से जाम को मापने का दावा किया था, उसका क्या हुआ? और वे नसीहतें कहाँ गईं, और वह नाव-नोश कहाँ है?
10
जुज़ लाला उस के जाम से पाते नहीं निशाँ है कोकनार उस की जगह अब सुबू ब-दोश
जुज़ लाला के जाम में कोई निशान नहीं मिलता, और कोकनार की जगह अब सुबू ब-दोश बन गया है।
11
झूमे है बेद जा-ए-जवानान मय-गुसार बाला-ए-ख़म है ख़िश्त सर पैर मय-फ़रोश
जवानी के महफ़िल में बेद झूमे हुए हैं, और महबूब का आकर्षण नशे की दुकान जैसा है।
12
'मीर' इस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने पर ऐ ज़बाँ-दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
मीर ने इस ग़ज़ल की बहुत तारीफ़ की थी मेरे ज़मीर ने, पर ऐ ज़बाँ-दराज़, मेरी ज़ुबान बहुत ख़ामोश हो गई है।
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