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'मीर' इस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ-दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश

Mir had praised this ghazal so much, my conscience, But oh, my tongue has become too quiet.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मीर ने इस ग़ज़ल की बहुत तारीफ़ की थी मेरे ज़मीर ने, पर ऐ ज़बाँ-दराज़, मेरी ज़ुबान बहुत ख़ामोश हो गई है।

विस्तार

यह शेर अंदरूनी सच और बाहरी चुप्पी के बीच के संघर्ष को दिखाता है। शायर कहते हैं कि ज़मीर (conscience) इस ग़ज़ल की तारीफ़ कर रहा है, लेकिन ज़बान बहुत खामोश हो चुकी है। यह भावनाओं के दबे रहने का एक बहुत ख़ूबसूरत चित्रण है—जब दिल कुछ गहरा महसूस करता है, मगर हालात उसे बोलने नहीं देते, तो एक अजीब सी बेचैनी और दर्द रह जाता है।

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