ग़ज़ल
काम आख़िर जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार आ ही गया
کام آخر جذبۂ بے اختیار آ ہی گیا
यह ग़ज़ल प्रेम के अदम्य जज़्बे और विरह की तड़प की जीत को दर्शाती है, जो आख़िरकार महबूब के दिल को पिघला ही देती है। इसमें इंतज़ार के चरम बिंदु और प्रियतम के आगमन से उपजे मिलन के परम आनंद को खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
काम आख़िर जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार आ ही गया
दिल कुछ इस सूरत से तड़पा उन को प्यार आ ही गया
2
जब निगाहें उठ गईं अल्लाह-री मेराज-शौक़
देखता क्या हूँ वो जान-ए-इंतिज़ार आ ही गया
3
हाए ये हुस्न-ए-तसव्वुर का फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू
मैं ये समझा जैसे वो जान-ए-बहार आ ही गया
4
हाँ सज़ा दे ऐ ख़ुदा-ए-इश्क़ ऐ तौफ़ीक़-ए-ग़म
फिर ज़बान-ए-बे-अदब पर ज़िक्र यार आ ही गया
5
इस तरह ख़ुश हूँ किसी के वादा-ए-फ़र्दा पे मैं
दर-हक़ीक़त जैसे मुझ को ए'तिबार आ ही गया
6
हाए काफ़िर-दिल की ये काफ़िर जुनूँ-अंगेज़ियाँ
तुम को प्यार आए न आए मुझ को प्यार आ ही गया
7
दर्द ने करवट ही बदली थी कि दिल की आड़ से
दफ़अ'तन पर्दा उठा और पर्दा-दार आ ही गया
8
दिल ने इक नाला किया आज इस तरह दीवाना-वार
बाल बिखराए कोई मस्ताना-वार आ ही गया
9
जान ही दे दी 'जिगर' ने आज पा-ए-यार पर
उम्र भर की बे-क़रारी को क़रार आ ही गया
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