ग़ज़ल
आज क्या हाल है यारब सर-ए-महफ़िल मेरा
آج کیا حال ہے یا رب سر محفل میرا
इस ग़ज़ल में शायर महफ़िल के बीच अपने दिल की बेबसी और इश्क़ की तड़प को बयां करता है, जहाँ महबूब उसका दिल छीन ले जाता है। इसमें ग़म के सोज़ और प्रेम की उस विवशता का मार्मिक चित्रण है जो आशिक़ को पूरी तरह विचलित कर देती है।
Source: rekhta · HI
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1
आज क्या हाल है यारब सर-ए-महफ़िल मेरा
कि निकाले लिए जाता है कोई दिल मेरा
हे ईश्वर, आज महफ़िल के बीच मेरी क्या हालत हो गई है कि कोई मेरा दिल ही निकाल कर लिए जा रहा है।
2
सोज़-ए-ग़म देख न बरबाद हो हासिल मेरा
दिल की तस्वीर है हर आईना-ए-दिल मेरा
मेरे ग़म की जलन को देखो कहीं मेरी ज़िंदगी की सारी कमाई बर्बाद न हो जाए, क्योंकि मेरे दिल का हर आईना सिर्फ़ मेरे ही दिल की तस्वीर दिखाता है।
3
सुब्ह तक हिज्र में क्या जानिए क्या होता है
शाम ही से मिरे क़ाबू में नहीं दिल मेरा
जुदाई के इस आलम में सुबह तक न जाने क्या होगा, जब शाम होते ही मेरा दिल मेरे क़ाबू में नहीं रहा है।
4
मिल गई इश्क़ में ईज़ा-तलबी से राहत
ग़म है अब जान मिरी दर्द है अब दिल मेरा
इश्क़ में तकलीफ़ चाहने की आदत से मुझे सुकून मिल गया है; अब ग़म मेरी जान बन गया है और दर्द मेरा दिल बन चुका है।
5
पाया जाता है तिरी शोख़ी-ए-रफ़्तार का रंग
काश पहलू में धड़कता ही रहे दिल मेरा
मेरे दिल की धड़कन में तुम्हारी तेज़ और चंचल चाल का अंदाज़ झलकता है; काश कि मेरा दिल मेरे सीने में हमेशा इसी तरह धड़कता रहे।
6
हाए उस मर्द की क़िस्मत जो हुआ दिल का शरीक
हाए उस दिल का मुक़द्दर जो बना दिल मेरा
अफ़सोस उस इंसान की क़िस्मत पर जो इस दिल का हमराज़ बना, और अफ़सोस उस दिल के मुक़द्दर पर जो आख़िरकार मेरा दिल बना।
7
कुछ खटकता तो है पहलू में मिरे रह रह कर
अब ख़ुदा जाने तिरी याद है या दिल मेरा
मेरे सीने में बार-बार कुछ चुभता तो है, अब ख़ुदा ही जाने कि यह तुम्हारी याद है या मेरा दिल।
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