ग़ज़ल

दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद

دنیا کے ستم یاد نہ اپنی ہی وفا یاد
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 9 shers· radif: याद

यह ग़ज़ल प्रेम की उस चरम अवस्था को दर्शाती है जहाँ आशिक़ दुनिया के सितम, अपने शिकवे और अपनी वफ़ा तक भूल जाता है। इस मुकम्मल समर्पण और बेखुदी के आलम में उसके दिल में केवल और केवल मोहब्बत का एहसास ही बाक़ी रह जाता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद
2
मैं शिकवा ब-लब था मुझे ये भी न रहा याद शायद कि मिरे भूलने वाले ने किया याद
3
छेड़ा था जिसे पहले-पहल तेरी नज़र ने अब तक है वो इक नग़्मा-ए-बे-साज़-ओ-सदा याद
4
जब कोई हसीं होता है सरगर्म-ए-नवाज़िश उस वक़्त वो कुछ और भी आते हैं सिवा याद
5
क्या जानिए क्या हो गया अरबाब-ए-जुनूँ को मरने की अदा याद न जीने की अदा याद
6
मुद्दत हुई इक हादसा-ए-इश्क़ को लेकिन अब तक है तिरे दिल के धड़कने की सदा याद
7
हाँ हाँ तुझे क्या काम मिरी शिद्दत-ए-ग़म से हाँ हाँ नहीं मुझ को तिरे दामन की हवा याद
8
मैं तर्क-ए-रह-ओ-रस्म-ए-जुनूँ कर ही चुका था क्यूँ आ गई ऐसे में तिरी लग़्ज़िश-ए-पा याद
9
क्या लुत्फ़ कि मैं अपना पता आप बताऊँ कीजे कोई भूली हुई ख़ास अपनी अदा याद
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दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद | Sukhan AI