ग़ज़ल

बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं

بے کیف دل ہے اور جیے جا رہا ہوں میں
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 6 shers· radif: जा रहा हूँ मैं

यह ग़ज़ल गहरे विषाद और भावनात्मक सूनेपन की मार्मिक अभिव्यक्ति करती है, जहाँ दिल की बे-कैफ़ी के बावजूद जीने की लाचारी दर्शाई गई है। शायर अपने ग़म को एक दौलत समझता है और निरंतर आहें भरकर उसे ज़िंदगी की ख़ाली सुराही से छलकाता रहता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं ख़ाली है शीशा और पिए जा रहा हूँ मैं
2
पैहम जो आह आह किए जा रहा हूँ मैं दौलत है ग़म ज़कात दिए जा रहा हूँ मैं
3
मजबूरी-ए-कमाल-ए-मोहब्बत तो देखना जीना नहीं क़ुबूल जिए जा रहा हूँ मैं
4
वो दिल कहाँ है अब कि जिसे प्यार कीजिए मजबूरियाँ हैं साथ दिए जा रहा हूँ मैं
5
रुख़्सत हुई शबाब के हमराह ज़िंदगी कहने की बात है कि जिए जा रहा हूँ मैं
6
पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूँ मैं
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बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं | Sukhan AI