ग़ज़ल

कसरत में भी वहदत का तमाशा नज़र आया

کثرت میں بھی وحدت کا تماشا نظر آیا
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 9 shers· radif: नज़र आया

यह सूफ़ी ग़ज़ल अनेकता में एकता (वहदत-उल-वजूद) के रहस्यवादी दर्शन को व्यक्त करती है। इसमें कवि सृष्टि के प्रत्येक रूप और विविधता में केवल एक परम तत्व के दर्शन करता है, जिसके दिव्य प्रकाश के आगे मंदिर-मस्जिद और काबा-कलीसा जैसे धार्मिक भेद मिट जाते हैं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
कसरत में भी वहदत का तमाशा नज़र आया जिस रंग में देखा तुझे यकता नज़र आया
2
जब उस रुख़-ए-पुर-नूर का जल्वा नज़र आया काबा नज़र आया न कलीसा नज़र आया
3
ये हुस्न ये शोख़ी ये करिश्मा ये अदाएँ दुनिया नज़र आई मुझे तो क्या नज़र आया
4
इक सरख़ुशी-ए-इश्क़ है इक बे-ख़ुदी-ए-शौक़ आँखों को ख़ुदा जाने मिरी क्या नज़र आया
5
जब देख न सकते थे तो दरिया भी था क़तरा जब आँख खुली क़तरा भी दरिया नज़र आया
6
क़ुर्बान तिरी शान-ए-इनायत के दिल ओ जाँ इस कम-निगही पर मुझे क्या क्या नज़र आया
7
हर रंग तिरे रंग में डूबा हुआ निकला हर नक़्श तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा नज़र आया
8
आँखों ने दिखा दी जो तिरे ग़म की हक़ीक़त आलम मुझे सारा तह-ओ-बाला नज़र आया
9
हर जल्वे को देखा तिरे जल्वों से मुनव्वर हर बज़्म में तू अंजुमन-आरा नज़र आया
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