ग़ज़ल
दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उन को सुनाई न गई
داستان غم دل ان کو سنائی نہ گئی
यह ग़ज़ल दिल के अनकहे दर्द और लाचारी की भावपूर्ण दास्तान बयां करती है, जहाँ चाहकर भी महबूब तक अपने दिल का हाल नहीं पहुँचाया जा सका। जुनून और दीवानगी के आलम में दुनिया की हर चीज़ भुला देने के बाद भी महबूब की अनमोल याद हमेशा दिल में ज़िंदा रहती है।
Source: rekhta · HI
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1
दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उन को सुनाई न गई
बात बिगड़ी थी कुछ ऐसी कि बनाई न गई
2
सब को हम भूल गए जोश-ए-जुनूँ में लेकिन
इक तिरी याद थी ऐसी जो भुलाई न गई
3
इश्क़ पर कुछ न चला दीदा-ए-तर का क़ाबू
उस ने जो आग लगा दी वो बुझाई न गई
4
पड़ गया हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का परतव जिस पर
ख़ाक में मिल के भी इस दिल की सफ़ाई न गई
5
क्या उठाएगी सबा ख़ाक मिरी उस दर से
ये क़यामत तो ख़ुद उन से भी उठाई न गई
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