ग़ज़ल

कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहे

کچھ اس ادا سے آج وہ پہلو نشیں رہے
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 17 shers· radif: रहे

यह ग़ज़ल महबूब के जादुई सानिध्य में आशिक़ के आत्म-विस्मरण और प्रेम की चरम अवस्था को दर्शाती है। प्रियतम की मनमोहक उपस्थिति में सांसारिक पहचान, ईमान और दुनिया के तमाम सरोकार मिट जाते हैं और केवल प्रेम की एकांत अनुभूति शेष रह जाती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहे जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे
2
ईमान-ओ-कुफ़्र और न दुनिया-ओ-दीं रहे ऐ इश्क़-ए-शाद-बाश कि तन्हा हमीं रहे
3
आलम जब एक हाल पे क़ाएम नहीं रहे क्या ख़ाक ए'तिबार-ए-निगाह-ए-यक़ीं रहे
4
मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-दर्द-आफ़रीं रहे शायद मिरे हवास ठिकाने नहीं रहे
5
जब तक इलाही जिस्म में जान-ए-हज़ीं रहे नज़रें मिरी जवान रहें दिल हसीं रहे
6
या-रब किसी के राज़-ए-मोहब्बत की ख़ैर हो दस्त-ए-जुनूँ रहे न रहे आस्तीं रहे
7
ता-चंद जोश-ए-इश्क़ में दिल की हिफ़ाज़तें मेरी बला से अब वो जुनूनी कहीं रहे
8
जा और कोई ज़ब्त की दुनिया तलाश कर ऐ इश्क़ हम तो अब तिरे क़ाबिल नहीं रहे
9
मुझ को नहीं क़ुबूल दो-आलम की वुसअतें क़िस्मत में कू-ए-यार की दो-गज़ ज़मीं रहे
10
ऐ इश्क़-ए-नाला-कश तिरी ग़ैरत को क्या हुआ है है अरक़ अरक़ वो तन-ए-नाज़नीं रहे
11
दर्द-ओ-ग़म-ए-फ़िराक के ये सख़्त मरहले हैराँ हूँ मैं कि फिर भी तुम इतने हसीं रहे
12
अल्लाह-रे चश्म-ए-यार की मोजिज़-बयानियाँ हर इक को है गुमाँ कि मुख़ातिब हमीं रहे
13
ज़ालिम उठा तू पर्दा-ए-वहम-ओ-गुमान-ओ-फ़िक्र क्या सामने वो मरहला-हाए-यक़ीं रहे
14
ज़ात-ओ-सिफ़ात-ए-हुस्न का आलम नज़र में है महदूद-ए-सज्दा क्या मिरा ज़ौक़-ए-जबीं रहे
15
किस दर्द से किसी ने कहा आज बज़्म में अच्छा ये है वो नंग-ए-मोहब्बत यहीं रहे
16
सर-दादगान-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत की क्या कमी क़ातिल की तेग़ तेज़ ख़ुदा की ज़मीं रहे
17
इस इश्क़ की तलाफ़ी-ए-माफ़ात देखना रोने की हसरतें हैं जब आँसू नहीं रहे
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