ग़ज़ल

मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं

محبت میں یہ کیا مقام آ رہے ہیں
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 7 shers· radif: रहे हैं

यह ग़ज़ल प्रेम की उस विरोधाभासी और बेचैन स्थिति को दर्शाती है, जहाँ मंज़िल पा लेने के बाद भी सफ़र खत्म नहीं होता। इसमें महबूब के इंतज़ार की बेकरारी और दिल को दिलासा देने की मीठी तड़प को संजीदगी से बयां किया गया है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं
मोहब्बत में यह कैसा पड़ाव आ रहा है कि हम मंज़िल पर पहुँच चुके हैं, फिर भी लगातार आगे चलते ही जा रहे हैं।
2
ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं
हम बार-बार यह कहकर अपने दिल को तसल्ली दे रहे हैं कि वे वहां से चल चुके हैं और अब आ ही रहे हैं।
3
वो अज़-ख़ुद ही नादिम हुए जा रहे हैं ख़ुदा जाने क्या क्या ख़याल आ रहे हैं
वे खुद-ब-खुद ही पछतावे और शर्मिंदगी से भरे जा रहे हैं; खुदा ही जाने उनके दिमाग में क्या-क्या ख्याल आ रहे हैं।
4
हमारे ही दिल से मज़े उन के पूछो वो धोके जो दानिस्ता हम खा रहे हैं
उन धोखों का मज़ा हमारे दिल से पूछिए, जो हम जान-बूझकर खा रहे हैं।
5
जफ़ा करने वालों को क्या हो गया है वफ़ा कर के भी हम तो शर्मा रहे हैं
ज़ुल्म और सितम करने वालों को न जाने क्या हो गया है, क्योंकि वफ़ा निभाने के बावजूद हम ही शर्मिंदा हो रहे हैं।
6
वो आलम है अब यारो अग़्यार कैसे हमीं अपने दुश्मन हुए जा रहे हैं
हे दोस्तों, अब ऐसी हालत है कि गैरों या दुश्मनों की क्या बात करें, हम खुद ही अपने दुश्मन बनते जा रहे हैं।
7
मिज़ाज-ए-गिरामी की हो ख़ैर या-रब कई दिन से अक्सर वो याद आ रहे हैं
हे ईश्वर, मेरे महबूब की ख़ैरियत और सलामती बनी रहे, क्योंकि पिछले कई दिनों से वे मुझे बहुत ज़्यादा याद आ रहे हैं।
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