ग़ज़ल
है दिल को जो याद आई फ़लक-ए-पीर किसी की
ہے دل کو جو یاد آئی فلک پیر کسی کی
यह ग़ज़ल विरह की गहरी वेदना और प्रियतम की अनवरत स्मृतियों को व्यक्त करती है। इसमें प्रेमी का यह दर्द झलकता है कि निरंतर रुदन, विलाप और आहों के बावजूद निष्ठुर महबूब के दिल पर कोई असर नहीं होता।
Source: rekhta · HI
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1
है दिल को जो याद आई फ़लक-ए-पीर किसी की
आँखों के तले फिरती है तस्वीर किसी की
ऐ बूढ़े आसमान, दिल को जैसे ही किसी की याद आई है, आँखों के सामने उसी का चेहरा और तस्वीर घूम रही है।
2
गिर्या भी है नाला भी है और आह-ओ-फ़ुग़ाँ भी
पर दिल में हुई उस के न तासीर किसी की
रोना भी है, विलाप भी है और आहें व चीख-पुकार भी, लेकिन इनमें से किसी का भी उसके दिल पर कोई असर नहीं हुआ।
3
हाथ आए है क्या ख़ाक तिरे ख़ाक-ए-कफ़-ए-पा
जब तक कि न क़िस्मत में हो इक्सीर किसी की
तुम्हारे पैरों की धूल किसी के हाथ कैसे लग सकती है, जब तक कि किसी की किस्मत में कोई अक्सीर (पारस/कीमिया) न लिखी हो।
4
यारो वो है बिगड़ा हुआ बातें न बनाओ
कुछ पेश नहीं जाने की तक़रीर किसी की
दोस्तो, वह नाराज़ है इसलिए बातें मत बनाओ; इस वक़्त उस पर किसी की भी बात या तक़रीर का कोई असर नहीं होने वाला।
5
नाज़ाँ न हो मुनइ'म कि जहाँ तेरा महल है
होवेगी यहाँ पहले भी ता'मीर किसी की
ऐ दौलतमंद, अपने महल पर घमंड मत कर, क्योंकि जहाँ आज तेरा महल खड़ा है, वहाँ पहले भी किसी की इमारत रही होगी।
6
मेरी गिरह-ए-दिल न खुली है न खुलेगी
जब तक न खुले ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर किसी की
मेरे दिल की गाँठ न कभी खुली है और न कभी खुलेगी, जब तक कि किसी की उलझी हुई ज़ुल्फ़ें नहीं खुल जातीं।
7
आता भी अगर है तो वो फिर जाए है उल्टा
जिस वक़्त उलट जाए है तक़दीर किसी की
जब किसी की तक़दीर उलट जाती है, तो अगर कोई आता भी है तो वह उलटे पाँव वापस लौट जाता है।
8
इस अबरू ओ मिज़्गाँ से 'ज़फ़र' तेज़ ज़ियादा
ख़ंजर न किसी का है न शमशीर किसी की
ऐ ज़फ़र, महबूब की भौंहों और पलकों से ज़्यादा तेज़ न तो किसी का ख़ंजर है और न ही किसी की तलवार।
9
जो दिल से उधर जाए नज़र दिल हो गिरफ़्तार
मुजरिम हो कोई और हो तक़्सीर किसी की
अगर निगाह उस तरफ़ जाए तो दिल गिरफ़्तार हो जाता है; यानी जुर्म कोई और (निगाह) करे और उसका क़सूरवार किसी और (दिल) को ठहराया जाए।
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