हाथ आए है क्या ख़ाक तिरे ख़ाक-ए-कफ़-ए-पा जब तक कि न क़िस्मत में हो इक्सीर किसी की

“How could the dust beneath your feet ever come to one's hand, unless an elixir has been written into one's destiny?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

तुम्हारे पैरों की धूल किसी के हाथ कैसे लग सकती है, जब तक कि किसी की किस्मत में कोई अक्सीर (पारस/कीमिया) न लिखी हो।

विस्तार

यहाँ शायर ने लफ़्ज़ 'ख़ाक' से एक बहुत ख़ूबसूरत पहलू पैदा किया है—'क्या ख़ाक' यानी कुछ भी नहीं, और 'ख़ाक-ए-कफ़-ए-पा' यानी महबूब के क़दमों की धूल। उनका कहना है कि उस धूल को पाना भी कोई आसान बात नहीं, क्योंकि वह आम मिट्टी नहीं बल्कि पारस या इक्सीर जैसी अनमोल है। जब तक किसी के मुक़द्दर में कोई ख़ास करामात या नेमत न लिखी हो, उसे महबूब के पाँव की धूल छूने का शर्फ़ भी नसीब नहीं हो सकता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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