ग़ज़ल

वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे

وہ ہوا نہ رہی وہ چمن نہ رہا وہ گلی نہ رہی وہ حسیں نہ رہے
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 10 shers· radif: न रहे

यह ग़ज़ल गुज़रे हुए दौर की याद और वक़्त के बेरहम बदलाव का मार्मिक बयान है। इसमें खोई हुई बहारों, अपनों की बेरुखी और दुनिया के बदलते मिज़ाज पर गहरा अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए ख़ुद के भी बदल जाने का दर्द बयां किया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे वो फ़लक न रहा वो समाँ न रहा वो मकाँ न रहे वो मकीं न रहे
न वह हवा रही, न वह बाग़ रहा, न वह गली रही और न वे सुंदर लोग रहे; न वह आसमान रहा, न वह समाँ रहा, न वे मकान रहे और न उनमें रहने वाले लोग रहे।
2
वो गुलों में गुलों की सी बू न रही वो अज़ीज़ों में लुत्फ़ की ख़ू न रही वो हसीनों में रंग-ए-वफ़ा न रहा कहें और की क्या वो हमीं न रहे
अब फूलों में फूलों जैसी खुशबू नहीं रही, अपनों में प्यार की आदत नहीं बची और हसीनों में वफ़ादारी का रंग नहीं रहा; दूसरों की क्या बात करें, अब हम खुद भी वैसे नहीं रहे।
3
न वो आन रही न उमंग रही न वो रिंदी ओ ज़ोहद की जंग रही सू-ए-क़िबला निगाहों के रुख़ न रहे और दर पे नक़्श-ए-जबीं न रहे
अब न वह आन-बान रही, न कोई उमंग बची और न ही रिंदी व परहेज़गारी की जंग रही; न तो निगाहें क़िबले की ओर मुड़ती हैं और न ही महबूब की चौखट पर माथा टेकने के निशान बाक़ी हैं।
4
न वो जाम रहे न वो मस्त रहे न फ़िदाई-ए-अहद-ए-अलस्त रहे वो तरीक़ा-ए-कार-ए-जहाँ न रहा वो मशाग़िल-ए-रौनक़-ए-दीं न रहे
अब न वे शराब के प्याले रहे, न वे मतवाले और न ही आदि-वचन (अहद-ए-अलस्त) पर जान देने वाले रहे; न तो दुनिया चलाने का वह तौर-तरीक़ा बचा और न ही धर्म की शोभा बढ़ाने वाले वे काम बाकी रहे।
5
हमें लाख ज़माना लुभाए तो क्या नए रंग जो चर्ख़ दिखाए तो क्या ये मुहाल है अहल-ए-वफ़ा के लिए ग़म-ए-मिल्लत ओ उल्फ़त-ए-दीं न रहे
ज़माना हमें चाहे कितना भी लुभाए या आसमान चाहे जितने नए रंग दिखाए, वफ़ादारों के लिए यह नामुमकिन है कि उनके दिल में अपनी क़ौम का दर्द और दीन की मोहब्बत न रहे।
6
तिरे कूचा-ए-ज़ुल्फ़ में दिल है मिरा अब उसे मैं समझता हूँ दाम-ए-बला ये अजीब सितम है अजीब जफ़ा कि यहाँ न रहे तो कहीं न रहे
मेरा दिल तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की गली में फँसा है, जिसे अब मैं आफ़त का जाल समझता हूँ। यह कैसा अजीब ज़ुल्म है कि अगर यह दिल यहाँ न रहे, तो फिर कहीं और भी नहीं रह सकता।
7
ये तुम्हारे ही दम से है बज़्म-ए-तरब अभी जाओ न तुम न करो ये ग़ज़ब कोई बैठ के लुत्फ़ उठाएगा क्या कि जो रौनक़-ए-बज़्म तुम्हीं न रहे
यह ख़ुशी की महफ़िल सिर्फ़ तुम्हारे दम से आबाद है, इसलिए अभी मत जाओ और यह सितम मत करो। जब महफ़िल की रौनक़ यानी तुम ही यहाँ नहीं रहोगे, तो कोई बैठकर क्या लुत्फ़ उठाएगा?
8
जो थीं चश्म-ए-फ़लक की भी नूर-ए-नज़र वही जिन पे निसार थे शम्स ओ क़मर सो अब ऐसी मिटी हैं वो अंजुमनें कि निशान भी उन के कहीं न रहे
वे महफ़िलें जो कभी आसमान की आँखों की रौशनी थीं और जिन पर सूरज व चाँद न्योछावर होते थे, अब इस तरह मिट चुकी हैं कि उनका कोई नाम-ओ-निशान भी बाक़ी नहीं रहा।
9
वही सूरतें रह गईं पेश-ए-नज़र जो ज़माने को फेरें इधर से उधर मगर ऐसे जमाल-ए-जहाँ-आरा जो थे रौनक़-ए-रू-ए-ज़मीं न रहे
नज़रों के सामने अब केवल वही चेहरे रह गए हैं जो ज़माने में उथल-पुथल मचाते हैं, जबकि दुनिया को संवारने वाले वे खूबसूरत लोग जो ज़मीन की रौनक थे, अब नहीं रहे।
10
ग़म ओ रंज में 'अकबर' अगर है घिरा तो समझ ले कि रंज को भी है फ़ना किसी शय को नहीं है जहाँ में बक़ा वो ज़ियादा मलूल ओ हज़ीं न रहे
यदि 'अकबर' ग़म और दुख में घिरा हुआ है, तो समझ ले कि दुख भी मिट जाने वाला है। इस दुनिया में किसी चीज़ को स्थायित्व नहीं है, इसलिए उसे बहुत अधिक उदास और दुखी नहीं रहना चाहिए।
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