वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे वो फ़लक न रहा वो समाँ न रहा वो मकाँ न रहे वो मकीं न रहे

“Gone is that breeze, gone is that garden, gone is that lane and those fair ones of old; gone is that sky, gone is that era, gone are those dwellings and the dwellers they hold.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

न वह हवा रही, न वह बाग़ रहा, न वह गली रही और न वे सुंदर लोग रहे; न वह आसमान रहा, न वह समाँ रहा, न वे मकान रहे और न उनमें रहने वाले लोग रहे।

विस्तार

यह शेर गुज़रे हुए ज़माने और खोई हुई रौनक के लिए एक बेहद भावुक विलाप है। शायर याद करता है कि वक्त की आंधी में न सिर्फ महकती हवाएं, गुलशन और महबूब की गलियाँ ख़त्म हुईं, बल्कि वो आशियाने और उन्हें आबाद करने वाले अपने भी रुख़सत हो गए। यह सिर्फ़ जगहों के उजड़ने का अफ़सोस नहीं, बल्कि एक पूरे दौर और उससे जुड़ी मासूम खुशियों के हमेशा के लिए मिट जाने की गहरी टीस है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

1 / 10Next →