“Those gatherings, once the very light of heaven's eye, for which the sun and moon sacrificed their splendor, have now been erased so utterly that not a trace of them remains.”
वे महफ़िलें जो कभी आसमान की आँखों की रौशनी थीं और जिन पर सूरज व चाँद न्योछावर होते थे, अब इस तरह मिट चुकी हैं कि उनका कोई नाम-ओ-निशान भी बाक़ी नहीं रहा।
यह शेर समय की बेदर्दी और इंसानी शान-ओ-शौकत के फना होने का बड़ा ही दर्दनाक मंज़र पेश करता है। कभी जो महफ़िलें इतनी पुरनूर थीं कि आसमान भी उन पर नाज़ करता था और सूरज-चाँद उन पर अपनी चमक न्योछावर करते थे, आज वक़्त की गर्द ने उन्हें ऐसे मिटा दिया है कि उनका नामो-निशान तक बाकी नहीं बचा। यह शेर हमें याद दिलाता है कि दुनिया की सबसे हसीन और रौशन रौनक़ें भी आख़िरकार ज़वाल और ख़ामोशी की चादर ओढ़ लेती हैं।
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