वो गुलों में गुलों की सी बू न रही वो अज़ीज़ों में लुत्फ़ की ख़ू न रही वो हसीनों में रंग-ए-वफ़ा न रहा कहें और की क्या वो हमीं न रहे

“No longer does the roses' fragrance dwell within the rose, nor does that tenderness remain in those we hold dear; The hue of faithful love has faded from the fair—why speak of others, when we ourselves are no longer who we were?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

अब फूलों में फूलों जैसी खुशबू नहीं रही, अपनों में प्यार की आदत नहीं बची और हसीनों में वफ़ादारी का रंग नहीं रहा; दूसरों की क्या बात करें, अब हम खुद भी वैसे नहीं रहे।

विस्तार

यह शेर बदलते वक्त और इंसानों के दरमियान खोती हुई मासूमियत का एक गहरा दर्द बयां करता है। शायर देखता है कि फूलों से महक, अपनों से अपनापन और महबूब से वफ़ा सब कुछ धीरे-धीरे गायब हो चुका है। मगर सबसे खूबसूरत और मार्मिक मोड़ शेर के आखिर में आता है, जहाँ दूसरों से शिकवा करने के बजाय शायर यह स्वीकार करता है कि इस दुनिया को बदलते-बदलते हम खुद भी तो पहले जैसे नहीं रहे।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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