“Neither that pride nor passion remains, nor the strife between piety and wine; no longer do eyes turn toward the holy shrine, nor bows the brow at love's threshold.”
अब न वह आन-बान रही, न कोई उमंग बची और न ही रिंदी व परहेज़गारी की जंग रही; न तो निगाहें क़िबले की ओर मुड़ती हैं और न ही महबूब की चौखट पर माथा टेकने के निशान बाक़ी हैं।
यह शेर दिल की उस बेबसी और ख़ामोशी को बयां करता है जहाँ इंसान हर जज़्बे और कशमकश से खाली हो जाता है। कभी ज़िंदगी में रिंदी और परहेज़गारी का एक द्वंद्व था और जीने की गहरी उमंग थी, मगर अब वह जुनून बुझ चुका है। हालत यह है कि न तो इबादत के लिए काबे की तरफ़ रुख़ करने की चाह बची है, और न ही महबूब की चौखट पर सजदा करने की तमन्ना। यह रूह की उस मुकम्मल बेनियाज़ी की तस्वीर है जहाँ दिल न तो ख़ुदा से जुड़ा रहता है और न दुनिया से।
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