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غزل

भला होगा कुछ इक अहवाल उस से या बुरा होगा

भला होगा कुछ इक अहवाल उस से या बुरा होगा
میر تقی میر· Ghazal· 12 shers

یہ غزل زندگی کی غیر یقینی صورتحال اور کسی کے رویے کے نتائج پر غور کرتی ہے۔ شاعر سوال کرتا ہے کہ उस शख़्स के साथ क्या होगा, چاہے نتیجہ اچھا ہو یا برا۔ یہ دل کے दर्द की नाज़ुकता और مختلف حالات میں زندگی کی عدم स्थिरता کو پیش کرتا ہے۔

نغمے لوڈ ہو رہے ہیں…
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1
भला होगा कुछ इक अहवाल उस से या बुरा होगा मआल अपना तिरे ग़म में ख़ुदा जाने कि क्या होगा
اس سے کچھ اچھا ہوگا یا برا، میرا کیا ہوگا یہ تو خدا ہی جانے۔
2
तफ़ह्हुस फ़ाएदा नासेह तदारुक तुझ से क्या होगा वही पावेगा मेरा दर्द-ए-दिल जिस का लगा होगा
تفہہوس فائدہ، نصیحت تدارک، تجھ سے کیا ہوگا؟ وہ ہی پا سکے گا میرا دردِ دل، جس کا لگا ہوگا।
3
कसो को शौक़ यारब बेश उस से और क्या होगा क़लम हाथ गई होगी तो सौ सौ ख़त लिखा होगा
محبت کرنے والے کو آپ کے سوا اور کیا شوق ہو سکتا ہے؟ اگر قلم ہاتھ میں ہوتی تو سینکڑوں خطوط لکھے جاتے।
4
दुकानें हुस्न की आगे तिरे तख़्ता हुई होंगी जो तू बाज़ार में होगा तो यूसुफ़ कब बिका होगा
حسن کی دکانیں تمہارے آگے بھی ہوں گی، اور تمہارا تختہ بکا گیا؛ اگر تم بازار میں ہوتے، تو یوسف کب بکا ہوتا۔
5
मईशत हम फ़क़ीरों की सी इख़वान-ए-द-ज़माँ से कर कोई गाली भी दे तो कह भला भाई भला होगा
ہم فقیروں کی طرح ہیں کہ اگر اس زمانے کے بھائیوں سے ہمیں کوئی گالی بھی مل جائے، تو بھی کہہ دینا کہ یہ بھلا ہوگا، بھائی، یہ بھلا ہوگا۔
6
ख़याल उस बेवफ़ा का हम-नशीं इतना नहीं अच्छा गुमाँ रखते थे हम भी ये कि हम से आश्ना होगा
اس بے وفا کی یاد ہم-نشی نہیں ہے، مگر ہم بھی سمجھتے تھے کہ وہ ہم سے آشنا ہوگا۔
7
क़यामत कर के अब ता'बीर जिस को करती है ख़िल्क़त वो उस कूचे में इक आशोब सा शायद हुआ होगा
وہ شاعر جو قیامت کے دن تعبیر کر سکتی ہے، شاید اس گلی میں ایک نالہ بن گیا ہوگا۔
8
अजब क्या है हलाक इश्क़ में फ़र्हाद-ओ-मजनूँ के मोहब्बत रोग है कोई कि कम उस से जिया होगा
عجب ہے فرہاد اور مجنوں کی محبت، یہ عشق کی بیماری ہے، کہ اس کے بغیر زندگی ادھوری رہے گی۔
9
हो क्यूँ ग़ैरत-ए-गुल-ज़ार वो कूचा ख़ुदा जाने लहू इस ख़ाक पर किन किन अज़ीज़ों का गिरा होगा
اے گلزار کے راستے، جو خدا جانے، یہ کیوں عزت کا ذریعہ نہیں ہے؟ اس خاک پر کتنے پیارے لوگوں کا لہو گرا ہو گا۔
10
बहुत हम-साए इस गुलशन के ज़ंजीरी रहा हूँ मैं कभू तुम ने भी मेरा शोर नालों का सुना होगा
میں اس گلشن میں تمہاری طرح ایک قید پرندہ رہا ہوں؛ شاید تم نے بھی نالوں کا میرا شور سنا ہوگا۔
11
नहीं जुज़ अर्श जागा राह में लेने को दम उस के क़फ़स से तन के मुर्ग़-ए-रूह मेरा जब रहा होगा
کسی کے جان لینے کے لیے عرش راستے میں نہیں جاگا، جب میرا روح کا قفس میں مرغے سا رہا ہوگا۔
12
कहीं हैं 'मीर' को मारा गया शब उस के कूचे में कहीं वहशत में शायद बैठे बैठे उठ गया होगा
کہیں ہیں 'میر' کو مارا گیا شب اس کے کوچے میں، کہیں وہشط میں شاید بیٹھے بیٹھے اٹھ گیا ہوگا۔
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