ग़ज़ल
डर तो मुझे किसका है कि मैं कुछ नहीं कहता
دَر تو مجہی کسکا ہی کہ مین کچہہ نہین کہتا
Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI
गीत सुनें
1
डर तो मुझे किसका है कि मैं कुछ नहीं कहता
पर हाल यह इफ़्शा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मुझे किसका डर है जो मैं कुछ नहीं कहता? पर यह बात तो ज़ाहिर हो ही जाती है कि मैं कुछ नहीं कहता।
2
नासेह यह गिला क्या है कि मैं कुछ नहीं कहता
तू कब मेरी सुनता है कि मैं कुछ नहीं कहता
ऐ नासेह, यह शिकायत कैसी कि मैं कुछ नहीं कहता? तू कब मेरी बात सुनता है, जो मैं कुछ कहूँ।
3
क्या पास-ए-शिकनी दूँ क़लियों को तुम्हारी
पर पास तुम्हारा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मैं तुम्हारी कलियों को वादाख़िलाफ़ी का उलाहना कैसे दूँ? फिर भी तुम्हारे लिहाज़ में मैं कुछ नहीं कहता।
4
मैं बोलूँ तो चुप होती मैं अब चुप ही तक
यह रंजिश-ए-बेजा है कि मैं कुछ नहीं कहता
अगर मैं बोलूँ तो तुम चुप हो जाती हो, इसलिए अब मैं ही चुप रहता हूँ; यह एक नाहक़ झगड़ा है कि मैं कुछ नहीं कहता।
5
कुछ ग़ैर से हो तो नहीं कही है पे जो पूछो
तो वो मैं मुकरता है कि मैं कुछ नहीं कहता
अगर ग़ैर से कुछ हुआ भी हो तो कुछ कहा नहीं जाता; पर जब पूछो तो वह मुझसे मुकर जाता है कि मैं तो कुछ कहता ही नहीं।
6
नासेह को जो चाहूँ तो अभी ठीक बना दूँ
पर ख़ौफ़ ख़ुदा का है कि मैं कुछ नहीं कहता
अगर मैं चाहूँ तो उपदेशक को इसी समय ठीक कर दूँ, पर मुझे ख़ुदा का डर है, इसलिए मैं कुछ नहीं कहता।
7
ऐसा क्या न कहे ग़ैर की गर बात न पूछो
यह हौसला मेरा है कि मैं कुछ नहीं कहता
अगर तुम मेरे बारे में पूछो तो प्रतिद्वंद्वी क्या-क्या न कह दे? यह तो मेरा हौसला है कि मैं कुछ नहीं कहता।
8
क्या कहती नसीबों को कि अग़्यार का शिकवा
सुन सुनके वो चुका है कि मैं कुछ नहीं कहता
मैं अपने नसीब से क्या शिकायत करूँ, जब रक़ीबों की शिकायतें सुन-सुनकर वह इतना थक चुका है कि मैं कुछ नहीं कहता।
9
मत पूछ कि किस वास्ते चुप लग गई ज़ालिम
बस क्या कहूँ मैं क्या है कि मैं कुछ नहीं कहता
मत पूछो कि ऐ ज़ालिम, किस वजह से मुझ पर चुप्पी छा गई। मैं क्या कहूँ, मेरा हाल ऐसा है कि मैं कुछ भी नहीं कहता।
10
चुपके से मेरे मिलने का गहरा दिलों में तेरी
इस वास्ते चर्चा है कि मैं कुछ नहीं कहता
तुझसे चुपके से मिलने की बात दिलों में गहरी बसी है, और इसी वजह से इसकी चर्चा होती है, क्योंकि मैं कुछ नहीं कहता।
11
हाँ तंग-दहानी का न करने के लिए बात
है उज़्र पर ऐसा है कि मैं कुछ नहीं कहता
हाँ, उसके छोटे-से मुँह की बात न करने का एक बहाना तो है, पर वह ऐसा है कि मैं उसके बारे में कुछ नहीं कहता।
12
बेचारा करो क़ाबिल-ए-दर्माँ नहीं यह दर्द
वरना मुझे सौदा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मुझे बेबस कर दो, पर यह दर्द इलाज के क़ाबिल नहीं है; वरना मुझे तो ऐसा जुनून है कि मैं कुछ नहीं कहता।
13
हर वक़्त है दुश्नाम हर एक बात में ताना
फिर इस पे यही कहता है कि मैं कुछ नहीं कहता
हर समय गालियाँ देता है और हर बात में ताना मारता है, फिर इसके ऊपर यही कहता है कि मैं तो कुछ कहता ही नहीं।
14
कुछ सुनके जो मैं चुप हूँ तो तुम कहती हो बोलो
समझो तो यह थोड़ा है कि मैं कुछ नहीं कहता
कुछ सुनकर जब मैं खामोश रह जाता हूँ तो तुम मुझसे कहती हो कि बोलो। समझो तो यह कोई छोटी बात नहीं कि मैं कुछ नहीं कहता।
15
सुनता नहीं वो वरना यह सरगोशी-ए-अग़्यार
क्या मुझको गवारा है कि मैं कुछ नहीं कहता
वो सुनता ही नहीं, वरना दुश्मनों की यह धीमी-धीमी फुसफुसाहट — क्या मुझे यह मंज़ूर है कि मैं कुछ न कहूँ?
16
मोमिन ब-ख़ुदा सेहर-बयानी का जब ही तक
हर एक को दावा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मोमिन, ख़ुदा की क़सम, तुम्हारी जादू-भरी वाणी का असर बस तभी तक है, जब हर कोई यह दावा करता है कि मैं कुछ नहीं कहता।
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