क्या पास-ए-शिकनी दूँ क़लियों को तुम्हारी — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“How could I reproach your buds for breaking faith with me? Yet out of regard for you, I say nothing at all.”
अर्थ
मैं तुम्हारी कलियों को वादाख़िलाफ़ी का उलाहना कैसे दूँ? फिर भी तुम्हारे लिहाज़ में मैं कुछ नहीं कहता।
विस्तार
शायर बड़ी कोमलता और संयम से बात कर रहा है। वह कहता है कि मैं तुम्हारी टूटी बातों और दिए गए दुखों का हिसाब दे सकता हूँ, जैसे मुरझाई हुई कलियाँ जो कभी खिल ही न पाईं। लेकिन तुम्हारे प्रति अपने आदर और लिहाज़ के कारण मैं चुप रहना ही चुनता हूँ। यहाँ मुहब्बत शोर नहीं मचाती, न इल्ज़ाम लगाती है। वह अपनी शिकायतें रोक लेती है ताकि महबूब की इज़्ज़त बनी रहे। इन शब्दों में दर्द भी है और शालीनता भी। शायर अपना ग़म अंदर ही रखना पसंद करता है, पर अपने प्रिय को शर्मिंदा नहीं करना चाहता। यह चुपचाप यह कहने का तरीका है कि मैं सब देखता हूँ, पर तुम्हारा मान मेरी शिकायतों से बढ़कर है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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