डर तो मुझे किसका है कि मैं कुछ नहीं कहता — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“Of whom am I afraid, that I say nothing at all? Yet this much stands revealed: that I say nothing at all.”
अर्थ
मुझे किसका डर है जो मैं कुछ नहीं कहता? पर यह बात तो ज़ाहिर हो ही जाती है कि मैं कुछ नहीं कहता।
विस्तार
शायर खुद से एक शांत सवाल करता है। आख़िर मुझे किसका डर है जो मैं कुछ नहीं कहता? सच तो यह है कि डरने की कोई बात नहीं। मगर मेरी यही ख़ामोशी मेरा राज़ खोल देती है। मेरा कुछ न कहना ही सब कुछ कह देता है। कभी-कभी चुप रहना शब्दों से ज़्यादा दिल की बात ज़ाहिर कर देता है। यहाँ एक प्यारी-सी बात छिपी है, कि कुछ न बोलकर भी वह सब कुछ बोल जाता है। उसकी ख़ामोशी खाली नहीं, उसमें वह सारा एहसास भरा है जिसे वह छिपाना चाहता है।
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