ग़ज़ल
वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला
वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला
यह ग़ज़ल जीवन के भ्रम और सच्चाई के बीच के अंतर को दर्शाती है। इसमें बताता है कि जो चीज़ें हमें वास्तविकता लगती हैं, वे अक्सर केवल सपने या दिखावा होती हैं।
गीत सुनें
1
वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला
याँ शर्म से अरक़ में डूब आफ़्ताब निकला
वह तो घर से अपने पीकर शराब निकला, और शर्म से अर्क में डूब आफ़ताब निकला।
2
आया जो वाक़िए में दरपेश आलम-ए-मर्ग
ये जागना हमारा देखा तो ख़्वाब निकला
जब मृत्यु का संसार वास्तविकता में द्वार पर आया, तो हमारा जागना देखकर यह सपना निकला।
3
देखा जो ओस पड़ते गुलशन में हम तो आख़िर
गुल का वो रू-ए-ख़ंदाँ चश्म-ए-पुर-आब निकला
गुलशन में ओस पड़ते हुए देखकर, हमने आखिरकार एक फूल के हंसते हुए रूप में, पानी से भरे नयन (आँख) को पाया।
4
पर्दे ही में चला जा ख़ुर्शीद तो है बेहतर
इक हश्र है जो घर से वो बे-हिजाब निकला
पर्दे में ही रहना ख़ुर्शीद बेहतर है, क्योंकि एक पुनरुत्थान (हश्र) उस व्यक्ति का है जो घर से बिना हिजाब के निकलता है।
5
कुछ देर ही लगी न दिल को तो तीर लगते
उस सैद-ए-नातवाँ का क्या जी शिताब निकला
दिल को तीर लगने का एहसास बस कुछ देर का था, लेकिन उस प्रिय 'सैद-ए-नातवाँ' के लिए मन में क्या चाहत जागी, ऐ शिताब।
6
हर हर्फ़-ए-ग़म ने मेरे मज्लिस के तईं रुलाया
गोया ग़ुबार दिल का पढ़ता किताब निकला
हर ग़म के अक्षर ने मेरे जमावड़े को आँसू से नहलाया, मानो दिल की धूल एक किताब साबित हुई।
7
रू-ए-अरक़-फ़िशाँ को बस पोंछ गर्म मत हो
उस गुल में क्या रहेगा जिस का गुलाब निकला
रू-ए-अरक़-फ़िशाँ को बस पोंछ गर्म मत हो, उस गुल में क्या रहेगा जिस का गुलाब निकला। इसका अर्थ है कि शराब के सार को बस गरम हाथों से पोंछना नहीं चाहिए, क्योंकि एक फूल में उसका क्या बचेगा, जिसका गुलाब पहले ही निकल चुका है।
8
मुतलक़ न ए'तिना की अहवाल पर हमारे
नामे का नामे ही में सब पेच-ओ-ताब निकला
इतिना की हालत पर, हमने पाया कि केवल हमारे नाम का ज़िक्र ही सबके उलझनों का कारण बन गया।
9
शान-ए-तग़ाफ़ुल अपने नौ-ख़त की क्या लिखें हम
क़ासिद मुआ तब उस के मुँह से जवाब निकला
शान-ए-तग़ाफ़ुल अपने नौ-ख़त की क्या लिखें हम, क़ासिद मुआ तब उस के मुँह से जवाब निकला। इसका अर्थ है कि हम अपने नौ-ख़त (कविता) में शान-ए-तग़ाफ़ुल (उदासीनता की महिमा) के बारे में क्या लिखें, जब क़ासिद मुआ के मुँह से जवाब निकल आया।
10
किस की निगह की गर्दिश थी 'मीर' रू-ब-मस्जिद
मेहराब में से ज़ाहिद मस्त-ओ-ख़राब निकला
मीर जी पूछते हैं कि मस्जिद के मेहराब से बाहर निकला वह ज़ाहिद (संत) किस की निगाहों की घूमती हुई नज़र थी।
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