किस की निगह की गर्दिश थी 'मीर' रू-ब-मस्जिद — मीर तक़ी मीर
“Whose glance's sweep was it, 'Mir', from the mosque's doorway, / A wild, intoxicated saint emerged from the archway.”
अर्थ
मीर जी पूछते हैं कि मस्जिद के मेहराब से बाहर निकला वह ज़ाहिद (संत) किस की निगाहों की घूमती हुई नज़र थी।
विस्तार
यह शेर आशिक़ की उलझन और दुनिया के दिखावे पर एक गहरा तंज है। शायर पूछते हैं कि मस्जिद की तरफ जो निगाहों का घूमना था, वह किसकी निशानी थी? और जवाब यह है कि मेहराब से एक 'ज़ाहिद' निकला, जो दिखने में भले ही सादा हो, लेकिन अंदर से पूरी तरह मस्त और बेपरवाह था। यह दिखाता है कि सच्चा पागलपन और सच्ची भक्ति एक-दूसरे में कैसे घुलमिल जाते हैं।
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