रू-ए-अरक़-फ़िशाँ को बस पोंछ गर्म मत हो — मीर तक़ी मीर
“Do not dry the essence of the wine with warm hands, For what remains in the flower, if its rose has bloomed?”
अर्थ
रू-ए-अरक़-फ़िशाँ को बस पोंछ गर्म मत हो, उस गुल में क्या रहेगा जिस का गुलाब निकला। इसका अर्थ है कि शराब के सार को बस गरम हाथों से पोंछना नहीं चाहिए, क्योंकि एक फूल में उसका क्या बचेगा, जिसका गुलाब पहले ही निकल चुका है।
विस्तार
यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब ने बहुत ही नज़ाकत से कहा है। शायर कहते हैं कि फूल की ओस (dew) को ज़्यादा गर्मी से पोंछना नहीं चाहिए। इसका मतलब है कि किसी चीज़ की प्राकृतिक खूबसूरती को जबरदस्ती या जल्दबाज़ी में बिगाड़ना नहीं चाहिए। जब गुलाब खिल चुका है, तो बची हुई ओस अपने आप जगह बना लेगी। यह जीवन की सहजता को स्वीकारने का संदेश है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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