देखा जो ओस पड़ते गुलशन में हम तो आख़िर — मीर तक़ी मीर

देखा जो ओस पड़ते गुलशन में हम तो आख़िर गुल का वो रू-ए-ख़ंदाँ चश्म-ए-पुर-आब निकला

“Seeing the dew that falls in the garden, we finally found A face of laughter in the eye, a fountain of tears.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

गुलशन में ओस पड़ते हुए देखकर, हमने आखिरकार एक फूल के हंसते हुए रूप में, पानी से भरे नयन (आँख) को पाया।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर ने बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में लिखा है। शायर कह रहे हैं कि जब बगीचे पर ओस पड़ती है, तो उन्हें आख़िरकार एहसास होता है कि उस फूल की जो मुस्कान है, वह असल में एक ऐसा چشم-ए-पुर-आब है। यह एक गहरा बिम्ब है जो बताता है कि महबूब की हँसी में भी कितना गहरा और बहता हुआ जज़्बा छिपा होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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