ग़ज़ल

रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं

रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं

यह ग़ज़ल एक तरह की आत्म-पहचान और अस्तित्व की भावना को दर्शाती है। शायर कहता है कि हम भी उस जगह के हैं जहाँ रफ़्तगाँ (विस्मृति/भूलना) है, और उस कारवाँ के भी साथी हैं। यह कविता एक व्यापक और साझा मानवीय अनुभव को व्यक्त करती है, जहाँ शायर खुद को एक गुलसिताँ (बाग़) और बुलबुल के रिश्ते में भी शामिल बताता है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं साथ उस कारवाँ के हम भी हैं
रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं, और उस कारवाँ के हम भी हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि हम भी यात्रियों के समूह में हैं और उस कारवाँ का भी हिस्सा हैं।
2
शम्अ ही सर न दे गई बर्बाद कुश्ता अपनी ज़बाँ के हम भी हैं
शम्अ ही सर न दे गई बर्बाद, कुश्ता अपनी ज़बाँ के हम भी हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि मैं तलवार या बाण से नहीं, बल्कि अपनी ज़बान से ही बर्बाद हो गया हूँ।
3
हम को मजनूँ को इश्क़ में मत बूझ नंग उस ख़ानदाँ के हम भी हैं
हमको मजनूँ को इश्क़ में मत समझना, हम भी उस खानदान के हैं।
4
जिस चमन-ज़ार का है तू गुल-ए-तर बुलबुल इस गुलसिताँ के हम भी हैं
जिस चमन-ज़ार का है तू गुल-ए-तर बुलबुल, इस गुलसिताँ के हम भी हैं। (अर्थात: जिस बाग का तू सबसे सुंदर फूल है, इस फूलों के बाग में हम भी एक बुलबुल हैं।)
5
नहीं मजनूँ से दिल क़वी लेकिन यार उस ना-तवाँ के हम भी हैं
मजनूँ से दिल क़वी नहीं, लेकिन यार उस ना-तवाँ के हम भी हैं।
6
बोसा मत दे किसू के दर पे नसीम ख़ाक उस आस्ताँ के हम भी हैं
नसीम, किसी के दर पर कोई आलिंगन मत देना, क्योंकि हम भी उसी आँगन की धूल हैं।
7
गो शब उस दर से दूर पहरों फिरें पास तो पासबाँ के हम भी हैं
गो शब उस दर से दूर पहरों फिरें, पर पास तो पासबाँ के हम भी हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि हम उस द्वार से बहुत दूर घूमते हैं, लेकिन फिर भी हम पास के पहरेदारों की तरह नज़दीक हैं।
8
वजह-ए-बेगानगी नहीं मालूम तुम जहाँ के हो वाँ के हम भी हैं
मुझे इस अलगाव का कारण नहीं पता, पर तुम जहाँ हो, हम भी वहीं होंगे।
9
मर गए मर गए नहीं तो नहीं ख़ाक से मुँह को ढाँके हम भी हैं
मरे या मरे नहीं, इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है; हम भी हैं जो अपने चेहरे को धूल से ढँकते हैं।
10
अपना शेवा नहीं कजी यूँ तो यार जी टेढ़े बाँके हम भी हैं
यार जी, हम भी टेढ़े-बाँके हैं, यह बात है। (यह कहने का मतलब है कि हम भी थोड़े मनचले या अजीब हैं।)
11
इस सिरे की है पारसाई 'मीर' मो'तक़िद उस जवाँ के हम भी हैं
इस सिरे की है पारसाई 'मीर' का अर्थ है कि यह सीमा या किनारा है, और 'मो'तक़िद उस जवाँ के हम भी हैं' का अर्थ है कि हम भी उस युवा के समर्पित हैं।
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