ग़ज़ल

न फिर रक्खेंगे तेरी रह में पा हम

न फिर रक्खेंगे तेरी रह में पा हम

यह ग़ज़ल विरह और प्रेम के गहरे भावों को व्यक्त करती है, जिसमें वक्ता अपने प्रिय के वियोग में अपने मन की पीड़ा और नियति के प्रति निराशा का भाव प्रकट करता है। इसमें प्रेम की अनिश्चितता और संबंधों की जटिलताओं को दर्शाया गया है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
न फिर रक्खेंगे तेरी रह में पा हम गए-गुज़रे हैं आख़िर ऐसे क्या हम
हम फिर तेरी याद को अपने दिल में नहीं रखेंगे। आखिर जीवन गुज़र गया है, तो हम क्या हैं?
2
खिंचेगी कब वो तेग़-ए-नाज़ यारब रहे हैं देर से सर को झुका हम
कब वह अपने नखरे का धनुष खींचेगी, मेरे प्रिय? हम तो बहुत देर से अपना सिर झुकाए बैठे हैं।
3
न जाना ये कि कहते हैं किसे प्यार रहें बे-लुत्फ़ियाँ ही याँ तो बाहम
यह नहीं पता कि वे प्यार किसे कहते हैं, या वे केवल खाली हैं या वास्तव में प्यार में हैं।
4
बने क्या ख़ाल-ओ-ज़ुल्फ़-ओ-ख़त से देखें हुए हैं कितने ये काफ़िर फ़राहम
शायर पूछ रहा है कि तुम्हारे बालों, ज़ुल्फ़ों और लेखन की सुंदरता से क्या देखना है, क्योंकि तुमने काफ़िरों को कितने अवसर प्रदान किए हैं।
5
मरज़ ही इश्क़ का बे-डोल है कुछ बहुत करते हैं अपनी सी दवा हम
यह कहते हुए कि इश्क़ का रोग ही कुछ अस्थिर है, शायर कहता है कि हम स्वयं इसके लिए अपना इलाज करते हैं।
6
कहीं पैवंद हूँ यारब ज़मीं के फिरेंगे उस से यूँ कब तक जुदा हम
हे प्रिय, मैं तो धरती का एक कण मात्र हूँ; हम उस स्रोत से यूँ कब तक बिछड़े रहेंगे।
7
हवस थी इश्क़ करने में व-लेकिन बहुत नादिम हुए दिल को लगा हम
इश्क़ करने में हवस थी, लेकिन बहुत नादिम हुए दिल को लगा हम।
8
कब आगे कोई मरता था किसी पर जहाँ में कर गए रस्म-ए-वफ़ा हम
पहले, क्या कोई किसी के लिए मरता था, जहाँ हमने वफ़ादारी का रिवाज़ कर दिया।
9
तआ'रुफ़ क्या रहा अहल-ए-चमन से हुए इक उम्र के पीछे रिहा हम
तआ'रुफ़ क्या रहा अहल-ए-चमन से? हम तो एक उम्र के पीछे रिहा हुए हैं।
10
मुआ जिस के लिए उस को न देखा न समझे 'मीर' का कुछ मुद्दआ' हम
जिस व्यक्ति की तलाश में मैं था, उसे देखा नहीं; मैं नहीं जानता कि 'मीर' का क्या दावा है।
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