ग़ज़ल
जो देखो मिरे शेर-ए-तर की तरफ़
जो देखो मिरे शेर-ए-तर की तरफ़
ये शेर-ए-तर की ओर देखो, गुहर की ओर नहीं। मेरा दिल और मेरी निगाहें सिर्फ उस फ़ितना-गर की तरफ़ हैं। इस शहर में मोहब्बत ने आग लगा दी है, और सब कुछ उस एक आकर्षण की ओर है।
गीत सुनें
1
जो देखो मिरे शेर-ए-तर की तरफ़
तो माइल न हो फिर गुहर की तरफ़
यदि तुम मेरी शेर जैसी छवि की ओर देखते हो, तो फिर रत्न की ओर आकर्षित मत होना।
2
कोई दाद-ए-दिल आह किस से करे
हर इक है सो उस फ़ित्ना-गर की तरफ़
कोई दाद-ए-दिल की आह किससे करे, हर एक तो उस फ़ितना-गर की तरफ़ है।
3
मोहब्बत ने शायद कि दी दिल को आग
धुआँ सा है कुछ इस नगर की तरफ़
शायद मोहब्बत ने दिल को आग लगा दी है, और इस शहर की तरफ़ धुआँ सा खिंचाव है।
4
लगीं हैं हज़ारों ही आँखें उधर
इक आशोब है उस के घर की तरफ़
हज़ारों आँखें उधर टिकी हैं, और एक फावड़ा उस घर की तरफ़ इशारा कर रहा है।
5
बहुत रंग मिलता है देखो कभू
हमारी तरफ़ से सहर की तरफ़
देखो, चाहे हमारी तरफ़ से रंग मिले या सहर की तरफ़ से, बहुत रंग मिलते हैं।
6
ब-ख़ुद किस को उस ताब-ए-रुख़ ने रखा
करे कौन शम्स-ओ-क़मर की तरफ़
किसके मन की मर्जी से यह मुखड़ा सजा है, कौन हिम्मत करेगा सूरज और चाँद की ओर देखने की।
7
न समझा गया अब्र क्या देख कर
हुआ था मिरी चश्म-ए-तर की तरफ़
अब्र ने यह नहीं समझा कि देखकर क्या हुआ, / मेरी चश्म-ए-तर की तरफ़ यह कैसे हुआ।
8
टपकता है पलकों से ख़ूँ मुत्तसिल
नहीं देखते हम जिगर की तरफ़
पलकों से लगातार खून टपक रहा है, फिर भी हम दिल की ओर नहीं देखते।
9
मुनासिब नहीं हाल-ए-आशिक़ से सब्र
रखे है ये दारू ज़रर की तरफ़
प्रेमी की हालत से सब्र नहीं है, यह शराब नशे के प्याले की ओर है।
10
किसे मंज़िल-ए-दिलकश-ए-दहर में
नहीं मील ख़ातिर सफ़र की तरफ़
इस दुनिया के मनमोहक गंतव्य में, किसी को भी सफ़र की ओर कोई रास्ता नहीं मिला।
11
रग-ए-जाँ कब आती है आँखों में 'मीर'
गए हैं मिज़ाज उस कमर की तरफ़
रग-ए-जाँ कब आँखों में आएगी, ऐ मीर? मिज़ाज उस कमर की ओर चला गया है।
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