ग़ज़ल
रात प्यासा था मेरे लोहू का
रात प्यासा था मेरे लोहू का
यह ग़ज़ल एक प्रेमी की तड़प और विरह की भावना को व्यक्त करती है, जिसमें वह प्रियतम के प्रेम की प्यास और उसके बिना जीवन की बेचैनी का वर्णन करता है। इसमें वियोग की पीड़ा, प्रेम के नशे और अपने यार के सौंदर्य पर ईर्ष्या जैसे गहन प्रेम भावों का चित्रण है।
गीत सुनें
1
रात प्यासा था मेरे लोहू का
हूँ दिवाना तिरे सग को का
रात प्यासा था मेरे लहू का, हूँ दीवाना तेरे संग को का। (अर्थ: मेरे लहू को रात में प्यास लगी थी, और मैं तेरे साथ का दीवाना हूँ।)
2
शोला-ए-आह जूँ-तूँ अब मुझ को
फ़िक्र है अपने हर बिन मू का
शोला-ए-आह, प्रिय, अब मुझको क्या फ़िक्र है? मैं तो अपने हर बिन मू का हूँ।
3
है मिरे यार की मिसों का रश्क
कुश्ता हूँ सब्ज़ा-ए-लब-ए-जू का
मेरे यार की मिसों का रश्क, कुश्ता हूँ सब्ज़ा-ए-लब-ए-जू का। (अर्थ: मेरे प्रिय के सौंदर्य की ईर्ष्या, जू के होंठों की हरियाली का बोझ है।)
4
बोसा देना मुझे न कर मौक़ूफ़
है वज़ीफ़ा यही दुआ-गो का
बोसा देना मुझे न कर मौक़ूफ़, क्योंकि यह वज़ीफ़ा यही दुआ-गो का है।
5
मैं ने तलवार से हिरन मारे
इश्क़ कर तेरी चश्म-ओ-अबरू का
मैंने तलवार से हिरन मारे, / इश्क़ कर तेरी चश्म-ओ-अबरू का।
6
शोर क़ुलक़ुल के होती थी माने
रीश-ए-क़ाज़ी पे रात मैं थूका
मैंने काज़ी के पंख पर रात में थूका था, जो कि शोरगुल वाली कोयल की आवाज़ जैसा था।
7
इत्र-आगीं है बाद-ए-सुब्ह मगर
खुल गया पेच-ए-ज़ुल्फ़ ख़ुश्बू का
सुबह की हवा इत्र और आग जैसी सुगंधित है, लेकिन तुम्हारे बालों के गुंथे हुए पेंच ने सुगंध छोड़ दी है।
8
एक दो हूँ तो सहर-ए-चश्म कहूँ
कारख़ाना है वाँ तो जादू का
अगर मैं इसे आँख की सुबह कहूँ, या अगर मैं इसे जादू का कारख़ाना कहूँ।
9
'मीर' हर-चंद मैं ने चाहा लेक
न छुपा इश्क़-ए-तिफ़्ल बद-ख़ू का
शायर कहते हैं कि मैंने वह झील चाही, पर अपने बच्चे के दिल का प्यार नहीं छिपाया।
10
नाम उस का लिया इधर-ऊधर
उड़ गया रंग ही मिरे रू का
किसी और का नाम इधर-उधर ले लिया गया, और मेरा रंग/स्वभाव ही उड़ गया।
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