शोर क़ुलक़ुल के होती थी माने — मीर तक़ी मीर

शोर क़ुलक़ुल के होती थी माने रीश-ए-क़ाज़ी पे रात मैं थूका

“The night I spat upon the judge's plume, Was like the sound of the noisy cooing.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मैंने काज़ी के पंख पर रात में थूका था, जो कि शोरगुल वाली कोयल की आवाज़ जैसा था।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ एक घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि एक बड़े टकराव को दर्शाता है। शायर साहब एक तरफ़ कबूतर की मीठी आवाज़ का ज़िक्र करते हैं, और दूसरी तरफ़ काज़ी के पंख पर थूकने का। यह महज़ अपमान नहीं है, बल्कि किसी व्यवस्था या नियम को तोड़ने का जज़्बा है। मिर्ज़ा तक़ी मीर बता रहे हैं कि ज़िंदगी में कुछ कृत्य इतने बड़े होते हैं कि उनका शोर, हर प्राकृतिक आवाज़ को दबा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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