एक दो हूँ तो सहर-ए-चश्म कहूँ — मीर तक़ी मीर

एक दो हूँ तो सहर-ए-चश्म कहूँ कारख़ाना है वाँ तो जादू का

“If I call it the dawn of the eye, or if I call it a workshop of magic.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

अगर मैं इसे आँख की सुबह कहूँ, या अगर मैं इसे जादू का कारख़ाना कहूँ।

विस्तार

यह शेर बताता है कि किसी भी चीज़ का महत्व उसके देखने के नज़रिए पर निर्भर करता है। शायर कहते हैं कि अगर हम किसी चीज़ को सिर्फ़ दो गिन लें, तो वह छोटी है। लेकिन अगर हम उस जगह को जादू का कारख़ाना मान लें, तो उसका मूल्य और उसका नज़ारा ही कुछ और हो जाता है। यह एक गहरे फ़र्क़ को बयां करता है... कि कैसे एक संदर्भ, पूरी हकीकत बदल देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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