ग़ज़ल

ग़लत है इश्क़ में ऐ बुल-हवस अंदेशा राहत का

ग़लत है इश्क़ में ऐ बुल-हवस अंदेशा राहत का

यह ग़ज़ल बताती है कि इश्क़ में कोई भी उम्मीद या राहत का अंदाज़ा लगाना गलत है। कवि कहता है कि इस दुनिया में केवल दर्द, दाग़, रंज और तकलीफ का रिवाज है। वह महबूब के दीवानेपन और जीवन के उतार-चढ़ावों के बीच प्रेम की अस्थिरता का वर्णन करता है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ग़लत है इश्क़ में ऐ बुल-हवस अंदेशा राहत का रिवाज इस मुल्क में है दर्द-ओ-दाग़-ओ-रंज-ओ-कुलफ़त का
ऐ बेचैन मन, इश्क़ में राहत की उम्मीद करना गलत है; इस देश का रिवाज़ दर्द, दाग़, ग़म और तकलीफ का है।
2
ज़मीं इक सफ़्हा-ए-तस्वीर बे-होशाँ से माना है ये मज्लिस जब से है अच्छा नहीं कुछ रंग सोहबत का
धरती को एक बेसुध तस्वीर का पन्ना माना गया है। जब से यह महफ़िल शुरू हुई है, संगत के रंग अच्छे नहीं हैं।
3
जहाँ जल्वे से उस महबूब के यकसर लबालब है नज़र पैदा कर अव्वल फिर तमाशा देख क़ुदरत का
जहाँ महबूब के नज़ारे से ऐश्वर्य भरा है, पहले एक नज़र पैदा करो, और फिर क़ुदरत का तमाशा देखो।
4
हनूज़ आवारा-ए-लैला है जान-ए-रफ़्ता मजनूँ की मूए पर भी रहा होता नहीं वाबस्ता उल्फ़त का
मजनूँ की दिवंगत आत्मा अभी भी लैला के लिए भटकती रहती है। प्रेम का जुड़ाव एक बाल पर भी टिका नहीं रहता।
5
हरीफ़-ए-बे-जिगर है सब्र वर्ना कल की सोहबत में नियाज़-ओ-नाज़ का झगड़ा गिरो था एक जुरअत का
हर कोई दिल का बे-जिगर है, जब तक कि सब्र न हो; क्योंकि कल की महफ़िल में भी नज़ाक और नज़ा का झगड़ा था, और एक हिम्मत की ज़रूरत थी।
6
निगाह-ए-यास भी इस सैद-ए-अफ़्गन पर ग़नीमत है निहायत तंग है ऐ सैद-ए-बिस्मिल वक़्त फ़ुर्सत का
निगाह-ए-यास भी इस सैद-ए-अफ़ग़न पर ग़नीमत है, और निहायत तंग है ऐ सैद-ए-बिस्मिल वक़्त फ़ुर्सत का। (अर्थ: अफगान के इस सैयद पर निराशा की नज़र भी एक नेमत है, जबकि बिस्मिल के सैयद को बहुत समय की फुर्सत की ज़रूरत है।)
7
ख़राबी दिल की इस हद है कि ये समझा नहीं जाता कि आबादी भी याँ थी या कि वीराना था मुद्दत का
दिल की खराबी इस हद तक है कि यह समझ नहीं आता कि यहाँ पहले बस्ती थी या यह लंबे समय तक वीरान रहा।
8
निगाह-ए-मस्त ने उस की लुटाई ख़ानका सारी पड़ा है बरहम अब तक कारख़ाना ज़ोहद-ओ-ताअत का
मस्ती भरी निगाह ने उसकी पूरी खानकाह लूट ली, और अब ज़ौद और आज़माइश का कारख़ाना वीरान पड़ा है।
9
क़दम टक देख कर रख 'मीर' सर दिल से निकालेगा पलक से शोख़-तर काँटा है सहरा-ए-मोहब्बत का
आपके कदम देखकर 'मीर' दिल से अपना आवरण हटा देगा। मोहब्बत के रेगिस्तान का काँटा पलक से अधिक शोख़ है।
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